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लोकतंत्र के इस महापर्व पर 96 वर्षीय इस बुजुर्ग शिक्षक ने कही ये बातें


रतसर (बलिया) स्थानीय कस्बा क्षेत्र के जनऊपुर गांव के 96 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके श्रीकान्त पाण्डेय चुनाव को लेकर आज भी उतने ही संजीदा है जैसे स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव को लेकर थे ।प्रथम चुनाव के अनुभव को साझा करते हुए बताते है कि स्वतन्त्रता के बाद हुए पहले आम चुनाव की यादें आज भी ताजा है । उन्होंने बताया कि 1944 में बतौर शिक्षक के पद पर जूहा० में नियुक्ति हुई । 1952 में देश के पहले चुनाव के दौरान उनकी ड्यूटी बलिया जनपद के बैरिया में लगाई गई थी। बैलेट बाक्स लेकर पूरी टीम पुलिस के साथ गई थी ।उस समय मतदान के लिए जो बाक्स मिलता था उसी बाक्स पर प्रत्याशी का नाम एवं उसका चुनाव चिह्न चिपका दिया जाता था। मतदान पूरा कराने के बाद बाक्स तहसील में जमा करते थे ।आगे बताया कि आज तक उन्होनें हर चुनाव में मतदान किया है और इस बार भी करेगें । उस समय लोग ज्यादा पढे लिखे नही थे। राजनीति से कोसों दूर थे। काग्रेंस एवं गांधीजी को ही सर्वोपरि मानते थे। यही वजह थी कि उस समय अन्य पार्टियों पर काग्रेंस हावी थी और जवाहर लाल नेहरू प्रधानमन्त्री बने। घरों से महिलाएं उस समय नई -नई साड़िया पहनकर गीत गाती हुई मतदान केन्द्र तक बड़े उत्साह के साथ जाती थी। हालांकि उनका मत प्रतिशत बहुत कम होता था।उस दौर में  बूथ कैप्चरिंग, प्रलोभन, जाति-धर्म के बारे में लोग सोच भी नही सकते थे। इस बात पर दुःख जताया कि चुनाव में बाहुबली एवं माफिया किस्म के  प्रत्याशियों का प्रवेश हो गया और बूथ कैप्चरिंग, प्रलोभन, जाति-धर्म पूरी तरह लोकतन्त्र पर हावी हो गयी। चुनाव में हिंसा होने लगी है तथा बाहुबली फर्जी मतदान के सहारे सदन तक पहुंच जा रहे है ।लेकिन एक बात से उनके मन में संतोष है कि जबसे इवीएम मशीन की तकनीकी आई है तब से चुनाव की गोपनीयता बढी है। सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था से फर्जी मतदान पर चुनाव आयोग काफी हद तक सफल रहा है।
96 वर्ष की उम्र में भी वह मतदान के प्रति सतर्क है उन्होंने कहा कि लोकतन्त्र के इस महापर्व में सबको बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना चाहिए । ईमानदार छवि के प्रत्याशी को प्राथमिकता के आधार पर चुने ।साथ ही मतदान के लिए अपने आस-पास के लोगों को भी प्रेरित करे ।पहले महिलाओं के शिक्षा स्तर बहुत कम था अधिकांश लड़कियां स्कूल का मुंह तक नही देख पाती थी अब हर क्षेत्र में महिलाएं अपना परचम लहरा रही है। इस कारण महिलाएं चुनाव में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगी है यह स्वस्थ लोकतन्त्र के लिए शुभ संकेत है।

रिपोर्ट- संवाददाता डॉ अभिषेक पाण्डेय

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