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उत्तर प्रदेश: वर्तमान ही नहीं, बलिया के भविष्य पर भी कहर है आर्सेनिक का जहर

     
बलिया (ब्यूरो)  अमरनाथ मिश्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय दूबेछपरा , बलिया के पूर्व प्राचार्य एवं पर्यावरणविद् डा० गणेश कुमार पाठक ने "खबरें आजतक Live" से हुई एक भेंटवार्ता में बताया कि बलिया के भूमिगत जल में प्राप्त आर्सेनिक का जहर न केवल इस क्षेत्र के वर्तमान के लिए बल्कि भविष्य के लिए भी एक भयंकर कहर है, जो धीरे- धीरे आर्सेनिक युक्त जल पीने वाले न केवल मानव को बल्कि पशुओं को भी अपने आगोश में लेकर अपना कहर बरपाता है और अन्ततः काल कवलित कर देता है।
डा० पाठक ने बताया कि आर्सेनिक एक ऐसा मीठा जहर है जो कभी भी स्वतन्त्र रूप से प्रकृति में नहीं प्राप्त होता है, बल्कि यह संयुक्तावस्था में विभिन्न तत्वों के साथ प्राप्त होता है। सामान्य रूप से सल्फर, आँक्सीजन, सीसा, तांबा एलं लोहा के साथ मिलता है। चट्टानों के टूटने की क्रिया या चट्टानों से जल रिसने पर आर्सेनिक भूमिगत जल के साथ मिश्रित हो जाता है। भूमिगत जल में आर्सेनिक का प्रवेश प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों कारणों से होता है। व्यापक स्तर पर कीटनाशी एवं खरपतवारनाशी रसायनों का कृषि कार्य में उपयोग ही भूमिगत जल में आर्सेनिक की मात्रा को बढ़ाने के लिए उत्तरदायी होता है। वर्तमान समय में व्यापक स्तर पर कीड़ों से फलों को बचाने हेतु पेड़ों पर छिड़काव करने हेतु काँपर साइनाइट का प्रयोग कीटनाशी की तरह एवं आर्सेनिक आक्साइड का प्रयोग खरपतवारनाशक के रूप में किया जा रहा है। यही नहीं बरसात के पानी से मिलकर आर्सेनिक यौगिक पृथ्वी की सतह पर आत हैं एवं रिसकर सतह के नीचे पहुँचकर भूमिगत जल में मिल जाता है।
चूँकि आर्सेनिक भूमिगत जल में अविलेय है, किन्तु इतना सूक्ष्म हैता है कि यह जल के साथ लटका रहता है। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि पाँवर प्लाण्ट में कोयला के जरने से भी आर्सेनिक उत्पन्न होता है जो नदियों द्वारा अपशिषँट के रूप में बहाकर लाया जाता है। यही कारण है कि नदियों के आस- पास कू क्षेत्रों आर्सेनिक अधिक पामा जाता है। भूवैज्ञानिकों का तो यह भी मत है कि आर्सेनिक गंगा धदी के उद्गम स्थल पर उत्पन्न होता है।
जहाँ तक बलिया जनपद में आर्सेनिक के कहर की बात है तो इस जनपद के 11 विकासखण्डों के 310 गाँव आर्सेनिक से प्रभावित हैं। स्कूर आँफ इन्वायरन्मेण्टल स्टडीज जादवपुर( प० बं०), भू- जल विभाग ,उत्तर- प्रदेश एवं आई आई टी कानपुर द्वारा किए गए अध्ययनों के अनुसार बलिया एवं गाजीपुर के भू- जल में आर्सेनिक अपने निर्धारित मात्रा से बहुत अधिक है। बलिया जनपद का द्वाबा क्षेत्र तो विशेष रूप से आर्सेनिक से प्रभावित है। द्वाबा क्षेत्र के लगभग 55 गाँवों के भूमिगत जल में आर्सेनिक की निरँधारित मात्रा 50 पी० पी० एम० से 100 - 200 पी० पी० एम० तक है। प्राप्त समाचारों के के अनुसार आर्सेनिक के प्रभाव से बलिया जनपद में अब तक  33 लोगों की मृत्यु हो चुकी है एवं सैकड़ों लोग पीड़ित हैं। 60 से अधिक लोग  'आर्सेनिकोसिस' नामक विमारी से ग्रसित हैं।
डा० पाठक ने बताया कि आर्सेनिक प्रभावित लोगों को न केवल शारीरिक एवं मानसिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से भी ये समाज से अलग- थलग पड़ते जा रहे हैं।  उनके द्वारा आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों का एक सामाजिक - आर्थिक सर्वेक्षण कराया गया है, जिससे यह निष्कर्ष निकला है कि आर्सेनिक प्रभावित लोग दवाओं पर अधिक खर्च करने के कारण आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं, जिसके लिए वे कर्ज लेते हैं और कर्ज के जाल में फँसते जा रहे हैं। यही नहीं आर्सेनिक कू प्रभाव से उनमें जो शारीरिक विकृतियां उत्पन्न हो रही हैं उसके चलते इस क्षेत्र में अब लोग अपनी लड़कियों की शादी भी नहीं करना चाहते हैं। इस तरह उन्हें सामाजिक वहिष्कार का सामना कयना पड़ यहा है।
यद्यपि कि आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों में सरकार द्वारा शुद्ध पेयजल हेतु उपाय किए गये हैं किन्तु वो नाकाफी हैं एवं कारगर भी नहीं है। कष्ट तो इह्स बात का है कि इतनी भयंकर एवं गम्भीर स्थिति के बावजूद भी आर्सेनिक कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया। क्या हमारे जन नेता संवेदनशून्य हो गये है उन्हें ऐसे मुद्दे दिखाई ही नहीं देते हैं।

रिपोर्ट- दीपक ओझा

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