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लापरवाही के फलस्वरूप हुये अमृतसर ट्रेन हादसे, मूर्ति विसर्जन एवं गोला बाँधकर पुतला जलाने की परम्परा पर विशेष


इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा जबकि पूरा देश नवरात्रि पर्व के दूसरे दिन विजयदशमी की खुशी में जगह जगह आयोजित होने वाले रावण वध कार्यक्रमों का आनंद से रहा था उसी बीच ऐसा तूफान आया कि देशवासियों के चेहरे की खुशी गम मे बदल गयी।जिस समय रावण का पुतला जलाया जा रहा था ठीक उसी समय रावण फूंकते समय अमृतसर पंजाब में एक ट्रेन हादसा हो गया है जिसमें सत्तर से ज्यादा लोगों की मौत हो गयी और तमाम लोग गंभीर रूप से घायल हो गये। यह दिल दहला देने एवं खुशी को मातम में तब्दील करने वाली यह घटना रेलवे लाइन के किनारे रावण का पुतला फूंकने के साथ गोलों के दगने के बाद बचाव में रेलवे ट्रैक पर हुयी।घटना के समय पुतले में लगे गोलों से बचने के लिए जैसे ही भीड़ भागकर लाइन पर आई उसी समय अचानक एक्सप्रेस ट्रेन के आ जाने के कारण हुयी।वैसे रेल हादसे होते रहते हैं लेकिन यह हादसा उन हादसों से हटकर है क्योंकि इसमें रेलवे मुसाफिर नहीं बल्कि राम रावण युद्ध एवं रामलीला का आनंद लेने वाले बेगुनाहों आमलोगों की दर्दनांक मौतें हुयी हैं।इसे भी दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि रामलीला के दौरान धमाकेदार जानलेवा गोलों को बांध रावण का पुतला बनाकर रेलवे ट्रैक के किनारे लगाया गया था।पुतला फूंकने के बाद जब गोले दगने लगे और उसके आसपास खड़े लोगों को जान खतरे में दिखाई देने लगी तो वह जान बचाने की गरज से भागकर रेलवे लाइन पर आये थे उन्हें क्या मालूम था कि वहाँ पर भी उनकी जान बचने वाली नहीं है और महाकाल के रूप में ट्रेन आ जायेगी।अगर वहाँ पर पहले से यह कार्यक्रम होता था तो जिला प्रशासन एवं रेलवे की जिम्मेदारी बनती थी कि वह सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करती। रेलवे लाइन के किनारे लगे दशहरा मेले में अगर सुरक्षा व्यवस्था होती तो पुतले के आसपास एवं लाइन पर लोगों को जाने ही दिया जाता या फिर रावण का पुतला रेलवे ट्रैक से विपरीत दिशा में लगाया गया होता। वैसे नवरात्रि में स्थापित मिट्टी की मूर्तियों के नदियों में विसर्जन एवं गोला तमाशा लगाकर रावण के पुतले को जलाने की प्रथा में बदलते समय के साथ इसमें भी बदलाव की जरूरत है। नदियों में मूर्ति विसर्जन होने से लोगों के डूबकर मरने के साथ ही साथ नदियों का पटना शुरू हो गया है और कल्याणी गोमती जैसी छोटी नदियों का अस्तित्व का खतरे में पड़ता जा रहा है।नदियों के अस्तित्व को बचाने के लिये हर साल मूर्ति खरीदकर स्थापित करने से बेहतर है कि स्थाई रूप से उसे स्थापित करके मूर्ति की जगह ज्योति का विसर्जन करने की परम्परा की शुरुआत की जाय। इसी तरह दशहरा पर्व पर रावण के पुतले गोला नहीं बल्कि पड़ाका लगाकर बनाने की जरूरत है क्योंकि भीड़ के बीच गोला दगने से कभी भी कोई अप्रिय घटना होने की संभावना बनी रहती है जैसा कि परसों अमृतसर में हुआ। सवाल यह नहीं है कि घटना में कौन दोषी है कौन नहीं है सवाल तो इस बात का है कि क्या रेलवे लाइन पर खड़ी भीड़ चालक को भी नहीं दिखाई पड़ी और भीड़ को रौंदता हुआ चला गया।घटना की सूचना पर जिलाधिकारी से लेकर मुख्यमंत्री तक पहुंच चुके हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी भी दुख व्यक्त कर सहायता की घोषणा कर चुके हैं।लेकिन दुख इस बात का है कि जो तेजी और गौर घटना के बाद किया गया वहीं तेजी एवं गौर अगल पहले कर लिया गया होता तो मेला रेलवे ट्रैक के किनारे बिना व्यापक सुरक्षा व्यवस्था के नहीं होता।दुखद यह भी जिस समय यह हादसा हुआ उस समय वहाँ के कांग्रेसी विवादित राजनेता नवज्योति सिद्धू की पत्नी वहाँ मौजूद थी जो घटना के बाद वहाँ से रफूचक्कर हो गयी। हम अपने पाठकों की तरफ से इस दुखद घड़ी में आज तक इस हादसे में मारे गये सभी बेगुनाह लोगों की आत्मा की शांति तथा हादसे के शिकार परिवारों को इस अपार असहनीय दुख सहन करने की शक्ति प्रदान करने के लिए ईश्वर से कामना करते हैं।इस घटना से सरकार और रेलवे प्रशासन दोनों को सबक लेकर भविष्य की नीतियों का निर्धारण करना ही जनमानस के लिए हितकर होगा।इस घटना में आमदर्शक ही नहीं नहीं मरे बल्कि रावण की भूमिका करने वाला भी अपने परिजनों को बचाने के चक्कर में मौत के गले लग गया।
           
रिपोर्ट- वरिष्ठ पत्रकार व समाजसेवी भोलानाथ मिश्र की कलम से

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