दोनों पैरों से दिव्यांग बेटी की शिक्षा का जिम्मा उठाने आगे आया प्रशासन, ट्राई साइकिल, हेलमेट और स्कूल बैग भी मिला, प्रभास की मदद के लिए भी मिला आश्वासन, जल्द ही प्रभास को व्हीलचेयर एवं अन्य आवश्यक सहायक उपकरण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू
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जिलाधिकारी पहुंचे महुलानपार गांव
सिकन्दरपुर (बलिया)। क्या किसी जरूरतमंद की समस्या प्रशासन तक पहुंचाने के लिए पहले उसका मीडिया में सामने आना जरूरी है? ग्राम सभा लखनापार के महुलानपार निवासी गुलाब चंद राम की दोनों पैरों से दिव्यांग बेटी ज्योति के मामले में रविवार को प्रशासन की सक्रियता ने यही सवाल खड़ा कर दिया है। मामला मीडिया के माध्यम से सामने आने के बाद जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह समेत जिले के आला अधिकारियों का दल 6 सितंबर 2026 दिन रविवार को ज्योति के घर पहुंचा। अधिकारियों ने ज्योति और उसके परिजनों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनीं और हरसंभव सहायता का भरोसा दिलाया। जिलाधिकारी ने ज्योति की शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए संबंधित अधिकारियों को कक्षा नौ में राष्ट्रीय इंटर कॉलेज, सण्डवापुर में उसका दाखिला कराने के निर्देश दिए।
शिक्षा की राह में बाधा नहीं बनेगी दिव्यांगता
जिलाधिकारी ने कहा कि दिव्यांगता किसी भी बच्चे की शिक्षा में बाधा नहीं बननी चाहिए। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को ज्योति की शैक्षणिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। प्रशासन की ओर से ज्योति को ट्राई साइकिल, हेलमेट और स्कूल बैग भी उपलब्ध कराया गया, ताकि वह विद्यालय आने-जाने में सुविधा के साथ सुरक्षित भी रह सके। अधिकारियों ने ज्योति के परिवार की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति की जानकारी लेते हुए पात्रता के आधार पर शासन की दिव्यांगजन कल्याण योजनाओं का लाभ दिलाने का भी भरोसा दिया। प्रशासन की इस पहल से परिवार के साथ-साथ ग्रामीणों में भी उम्मीद जगी है।
ज्योति के बाद प्रभास की समस्या पर भी लिया संज्ञान
इसी दौरान महुलानपार में ही ग्राम सभा कोथ निवासी 12 वर्षीय प्रभास कुमार पुत्र अमित कुमार गुप्ता की समस्या भी अधिकारियों के समक्ष रखी गई। पैरों से असमर्थ होने के कारण प्रभास विद्यालय नहीं जा पा रहा है। वह वर्तमान में कक्षा पांच का छात्र है। मामले को गंभीरता से लेते हुए जिला दिव्यांगजन अधिकारी पारसनाथ यादव कोथ गांव जाकर प्रभास की स्थिति का जायजा लिया और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। जिला दिव्यांगजन अधिकारी के अनुसार प्रभास की शिक्षा बाधित न हो, इसके लिए निःशुल्क आवश्यक शिक्षा व्यवस्था एवं आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि जल्द ही प्रभास को व्हीलचेयर एवं अन्य आवश्यक सहायक उपकरण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जाएगी।
क्यों नहीं दिखी ज्योति और प्रभास की परेशानी?
जिलाधिकारी की संवेदनशील पहल निश्चित रूप से सराहनीय है। लेकिन इसी के साथ एक असहज सवाल भी खड़ा होता है क्या ज्योति और प्रभास जैसे बच्चों की समस्याएं प्रशासनिक व्यवस्था को तब तक दिखाई नहीं देतीं, जब तक मीडिया उन्हें सामने न लाए? यदि मीडिया की खबर के बाद प्रशासन कुछ ही समय में संबंधित परिवार तक पहुंच सकता है, तो फिर सरकारी मशीनरी के नियमित निरीक्षण, ग्राम पंचायत स्तर की व्यवस्था और विभागीय निगरानी तंत्र को इन समस्याओं की जानकारी पहले क्यों नहीं हुई? क्या संबंधित विभागों के अधिकारी अपने स्तर पर क्षेत्र का नियमित सर्वेक्षण करते हैं? क्या दिव्यांग बच्चों की शिक्षा, सहायक उपकरण और सरकारी योजनाओं की जरूरत वाले परिवारों का कोई प्रभावी रिकॉर्ड और फॉलोअप व्यवस्था है?
मीडिया की खबर के बाद ही क्यों
यह सवाल सिर्फ ज्योति और प्रभास तक सीमित नहीं है। जिले में समय समय पर ऐसी तस्वीरें सामने आती रही हैं, जहां किसी जरूरतमंद की समस्या पहले मीडिया की खबर बनती है और उसके बाद प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय दिखाई देती है। मीडिया जब किसी गांव की टूटी सड़क, बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था, सरकारी योजनाओं में देरी, दिव्यांग बच्चों की परेशानी या अन्य जनसमस्याओं को उजागर करता है, तब संबंधित विभाग अचानक सक्रिय हो जाते हैं। कार्रवाई होती है, अधिकारी मौके पर पहुंचते हैं और समाधान के निर्देश जारी किए जाते हैं। तो फिर सवाल यह है कि प्रशासन का सिस्टम खुद इन समस्याओं तक क्यों नहीं पहुंच पाता? अगर मीडिया की एक खबर किसी जरूरतमंद परिवार तक प्रशासन को पहुंचा सकती है, तो सरकारी तंत्र के पास मौजूद विभागीय नेटवर्क, ग्राम पंचायत व्यवस्था और क्षेत्रीय कर्मचारियों की जिम्मेदारी आखिर क्या है?
समस्या से पहले चाहिए समाधान
ज्योति के मामले में प्रशासन की पहल से एक परिवार को राहत मिली है और प्रभास के लिए भी उम्मीद जगी है। लेकिन वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब ऐसी स्थिति वाले बच्चों को मीडिया की खबर का इंतजार किए बिना सरकारी व्यवस्था स्वयं चिन्हित करे और उन्हें समय रहते शिक्षा, स्वास्थ्य, सहायक उपकरण एवं सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़े। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन केवल शिकायत या मीडिया रिपोर्ट के बाद सक्रिय होने के बजाय प्रो-एक्टिव सिस्टम विकसित करे। गांव-गांव सर्वे हो, पात्र दिव्यांग बच्चों की पहचान हो और उनकी जरूरतों का नियमित फॉलोअप किया जाए।
गांव में दिखी प्रशासनिक सक्रियता
जिलाधिकारी के महुलानपार पहुंचने की सूचना पर सफाईकर्मी भी सुबह से गांव में पहुंच गए और सफाई व्यवस्था में जुट गए। ग्रामीणों ने प्रशासन की पहल की सराहना करते हुए कहा कि दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और सुविधाओं को लेकर प्रशासन की संवेदनशीलता से समाज में सकारात्मक संदेश गया है।
यें माननीय रहें मौजूद
इस अवसर पर एसडीएम प्रवीण यादव, मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अभय नारायण राय, तहसीलदार अमित सिंह, नायब तहसीलदार दुर्गेश गोड़, जिला दिव्यांगजन अधिकारी पारसनाथ यादव, बीडीओ पंदह प्रकाश प्रसाद, एडीओ पंचायत प्रदीप वर्मा, खंड शिक्षा अधिकारी सुनील कुमार चौबे, कोतवाल सिकन्दरपुर सुशील कुमार दुबे तथा ग्राम प्रधान प्रतिनिधि पप्पू यादव सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहें। अभिराम, अमरनाथ, निरंजन राम, हरिशंकर प्रसाद, परशुराम, दीनानाथ समेत सैकड़ों ग्रामीणों ने प्रशासन की इस पहल की सराहना की।
अब आखिरी सवाल
ज्योति और प्रभास को मदद मिलना अच्छी खबर है, लेकिन असली सवाल अब भी बाकी है- क्या अगली ज्योति या अगला प्रभास प्रशासन की नजर में आने से पहले फिर मीडिया की खबर बनने का इंतजार करेगा? प्रशासन को यह तय करना होगा कि उसकी व्यवस्था ‘खबर के बाद जागने वाली मशीनरी’ बनेगी या समस्या पैदा होने से पहले पहचान कर समाधान करने वाला एक मजबूत सिस्टम।
रिपोर्ट- विनोद कुमार गुप्ता

