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पर्यावरण, पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता के लिए घातक सिद्ध हो रहा है वन्यजीवों का विनाश- डा० गणेश पाठक


बलिया (ब्यूरों) अमरनाथ मिश्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय दूबेछपरा, बलिया के पूर्व प्राचार्य, पर्यावरणविद् डा० गणेश कुमार पाठक ने 6 अक्टूबर को वन्य संरक्षण दिवस पर "खबरें आजतक Live" बेव मीडिया से भेंटवार्ता में बताया कि आज तीव्रगति से हो रहे वन्यजीवों के विनाश के चलते पर्यावरण, पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता असंतुलित होती जा रही है, जिसके चलते मानव पर संकट मँडराने लगा है।भारत की वन्य सम्पदा बेहद समृध्द रही है और कुछ सदियों पूर्व तक तो विश्व भर में प्राप्त जीव - जातियों में से लगभग 35 प्रतिशत अपने देश की वन्यजीव सम्पदा में शामिल थीं। अपने देश में वन्य स्तनियों की लगभग 350 जातियाँ, वन्य पक्षी की लगभग 2100 जातियाँ, सरीसृप एवं उभयचर की लगभग 500 जातियाँ, साँपों की लगभग 250 जातियाँ, मछलियों की लगभग 2500 जातियाँ तथा कीट एवं अर्थोपोडा की लगभग 30,000 जातियाँ पायी जाती हैं।

वन्यप्राणियों के विनाश के कारण-
वन्यप्राणियों का विनाश यद्यपि कि प्राकृतिक रूप से भी होता रहा है, किन्तु प्राकृतिक विनाश असंतुलन पैदा नहीं करता है। बल्कि मानवजन्य कारणों से वन्यजीवों का बेतहाशा गति से जो विनाश किया जा रहा है उससे प्रकृति में असंतुलन उत्पन्न होता जा रहा है, कारण कि वन्यजीवों के विनाश पर्यावरण, पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता भी असंतुलित हो रही है, जिससे मानव जगत के लिए भी खतरा उत्पन्न होता जा रहा है। वन्यजीवों के विनाश के लिए उत्तरदायी कारणों में तीव्र जनसंख्या वृध्दि, मानव की बढ़ती धन पिपासा, बढ़ता औद्योगिकीकरण, बढ़ता प्रदूषण, अवैध तरीके से किए जा रहे शिकार एवं सबसे ज्यादा वनों का विनाश उत्तरदायी है।

वन्यप्राणियों का विनाश-
उपर्युक्त कारणों से अपने देश में वन्य स्तनियों की लगभग 80, वन्य पक्षियों की लगभग 30 तथा वन्य सरीसृपों एवं उभयचरों की लगभग 15 जातियाँ विलुप्तप्राय हैं। अपने देश में लगभग 724 जीव- जंतु विलुप्त हो गये हैं एवं 22530 विलुप्ति के कगार पर हैं। अपने देश में पेड़- पौधों की 384, मछलियों की 23, उभयचरों की 2, सरीसृपों की 21, बिना रीढ़ वाले जीव- जंतुओं की 98, पक्षियों की 113 एवं स्तनधारियों की 83 जातियाँ विलुप्त हो चुकी है , जबकि इन जीव - जंतुओं की क्रमशः 19079, 343, 50, 170, 1355, 1037 एवं 497 जातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं।

वन्य जीव संरक्षण-
यद्यपि कि अपने देश में वन्यप्राणियों के संरक्षण की भावना प्राचीन काल से ही भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति  में प्रेम- भाव एवं सह अस्तित्व के रूप में विद्यमान रही है और यही कारण है कि अपने यहाँ हिंसक एवं अहिंसक सभी प्रकार जीव- जंतुओं को देवी-देवताओं का वाहन बना दिया, ताकि उनको कोई विनष्ट न कर सके  और सम्भवतः इसी लिए अन्य देशों की तुलना में भारत में वन्यजीवों का विनाश कम हुआ है।किन्तु आधुनिक काल में ये मान्यताएं ध्वस्त होती गयीं और हम अपने स्वार्थवश वन्यजीवों का अंधा - धुंध विनाश किया जाने लगा, जिसकी परिणीति यह हो रही है कि प्रकृति भी असंतुलन का शिकार होती जा रही है और प्राकृतिक आपदाएँ हमारा विनाश करने को तत्पर है। वन्यप्राणियों के विनाश को देखते हुए ही सन् 1972 में ही भारत सरकार द्वारा " भारतीय वन्य संरक्षण अधिनियम " जारी किया गया किन्तु इस अधिनियम का पूर्णतः अनुपालन न होने के कारण वन्यजीवों के विनाश पर समुचित रोक नहीं लग पा रही है। मात्र कानून बना देने से ही वन्यजीवों का विनाश नहीं रूकेगा, बल्कि हम सबका कर्तव्य बनता है कि हम जहा भी हैं, वहीं से अपने स्तर से वन्यजीवों का विनाश होने से रोकें एवं अधिक से अधिक जन जागरूकता पैदा करें कि अगर जीव- जंतु नहीं बचेंगें तो हमारा अस्तित्व भी समाप्त हो जायेगा।
रिपोर्ट- संवाददाता डॉ अभिषेक पाण्डेय

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