गोरखपुर (ब्यूरो) लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है, सभी राजनीतिक पार्टियां चुनावी अखाड़ें में उतर चुकी हैं. ऐसे में देश की नज़र 80 लोकसभा सीटों वाली उत्तर प्रदेश पर है। सुबे की राजनीति के लिए ये चुनाव इस लिहाज से भी काफी दिलचस्प है क्योंकि यहां का राजनीतिक माहौल 2014 के मुकाबले पूरी तरह बदल चुका है. 2014 के लोकसभा चुनाव में 71 सीटों के साथ बंपर जीत पाने वाली बीजेपी को हराने के लिए इस बार सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल एक साथ चुनावी मैदान में हैं. वहीं, दूसरी ओर प्रियंका गांधी की राजनीतिक पारी शुरू करने से कांग्रेसी खेमे में भी उत्साह और उमंग स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। आज हम आपको उत्तर प्रदेश के हाईप्रोफाइल लोकसभा सीट गोरखपुर लोकसभा सीट के बारे में बताएंगे।
हाई प्रोफाइल गोरखपुर लोकसभा सीट के मतदान पर एक नजर-
राप्ती नदी के किनारे बसा ये शहर गोरखपुर जिले का नगरीय इलाका है और इस सीट का नाम गोरखपुर लोकसभा सीट है, गोरखपुर लोकसभा सीट पर हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल 19,03,988 लाख वोटर थें. कुल 10,40,822 लाख लोगों ने मतदान किया था जिसमें 5,82,909 पुरूष और 4,57,008 महिलाएं थीं. करीब 54.67 फीसदी मतदाताओं ने वोटिंग की थी. विधानसभा और नगर निगम के चुनाव नतीजे इस बात की चुगली करते हैं कि ये इलाका बीजेपी का गढ़ है.गोरखपुर लोकसभा सीट में 5 विधानसभा सीटें हैं-
1 = कैंपियरगंज
2 = पिपराइच
3 = गोरखपुर शहरी
4 = गोरखपुर ग्रामीण
5 = सहजनवा
एक नजर गोरखपुर के राजनीतिक सियासी सफर पर-
अभी तक इस सीट पर 18 बार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं. सबसे ज्यादा सात बार बीजेपी जीतने में कामयाब रही, पांच बार कांग्रेस को जीत मिली, इसके अलावा दो बार निर्दलीय, एक बार हिंदू महासभा, एक बार भारतीय लोकदल और 2018 में हुए उपचुनाव में सपा का खाता खुला।
1951-52 में हुए चुनाव में कांग्रेस के सिंहासन ने जीत हासिल की. वो 1962 तक यहां से लगातार सांसद चुने गए. 1967 में निर्दलीय उम्मीदवार गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजयनाथ ने जीत दर्ज की. इसके बाद उनकी सियासी विरासत महंत अवैधनाथ ने संभाली और 1970 में वो निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की.1971 में एक बार फिर कांग्रेस ने नरसिंह नारायण पांडेय के जरिए वापसी की, लेकिन 1977 में हरिकेश बहादुर भारतीय लोकदल जीतने में कामयाब रहे थे. इसके बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया और 1980 में फिर जीत हासिल की. इसके बाद 1984 में कांग्रेस के मदन पांडेय सांसद चुने गए. हालांकि इस सीट पर इसके बाद कांग्रेस अब तक वापसी नहीं कर सकी.1989 से महंत अवैद्यनाथ ने यहां से हिंदू महासभा उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की. इसके बाद 1991 में उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया और 1991 और 1996 में जीत का परचम लहराया. 1998 में योगी आदित्यनाथ उनके राजनीतिक विरासत को संभालने उतरे और इस पर लगातार जीतते रहे तथा 2014 तक लगातार पांच बार इस सीट से सांसद चुने गए. लेकिन सीएम बनने के बाद 2017 में उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया और 2018 में हुए उपचुनाव में सपा के प्रवीण कुमार निषाद बसपा के समर्थन के बदौलत यहां से सांसद चुने गए।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो 2018 में हुए उपचुनाव में बीजेपी के हार का बड़ा कारण जातीय समीकरण था। आपको बता दें कि यदि उम्मीदवार गोरक्ष पीठ का होता है तो हर जाति के लोग उसका समर्थन करते हैं, और इसका बड़ा वजह ये है कि गोरखनाथ मंदिर का वहां के विकास में अहम भूमिका है. मठ के अपने स्कूल, कॉलेज हैं. इसके अलावा अस्पताल और तमाम तरह के दूसरे संस्थान हैं जिनसे वहां के स्थानीय लोग लंबे समय से जुडे हुए हैं. सियासी पंडितों की मानें तो चुनाव में हार का एक बड़ा कारण प्रत्याशी का मठ से सीधा संबंध नहीं होना था। अगर एक नजर गोरखपुर के जातीय समीकरण पर डाले तो पता चलता है की गोरखपुर लोकसभा सीट में सबसे ज्यादा निषाद मतदाता है जिनकी संख्या लगभग 4 लाख है. पिपराइच और गोरखपुर ग्रामीण में सबसे ज्यादा निषाद मतदाता हैं.यहां पिछड़े व दलित वोटरों की बहुलता है. इस सीट पर करीब 1.50 लाख मुस्लिम मतदाता हैं.ब्राह्मण मतदाता इस सीट पर 1.50 लाख हैं और राजपूत मतदाओं की संख्या 1.30 लाख हैं. यादव 1.60 लाख और 1.40 लाख सैंथवार मतदाता हैं. वैश्य और भूमिहार मतदाताओं की संख्या यहां 1 लाख के आस-पास है. ऐसे में देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या योगी आदित्यनाथ अपनी विरासत वाली सीट को एक बार फिर से अपने कब्जे में ले पाते हैं या गठबंधन पुनः जीत का परचम लहरा पाता हैं।
रिपोर्ट- विनोद कुमार गुप्ता, सत्यम राय

