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बिहार: कन्हैया या गिरिराज किसका होगा बेगूसराय पर राज, एक नजर बेगूसराय के सियासी इतिहास पर


लोकसभा चुनावों की तारीखें जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, देश का सियासी पारा भी चढ़ता जा रहा है। देश के सारे क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीतिक दल चुनावी रण क्षेत्र में पूरी तैयारी और दमखम के साथ उतर चुके हैं। इन सभी सियासी दलों का 40 लोकसभा सीट वाली बिहार पर विशेष नजर है। बिहार की बात करें तो पूरब का लेनिनग्राद कहा जाने वाला बेगूसराय सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो चला है। जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने यहां से दावा ठोक कर इस सीट को हॉट केक बना दिया है, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी की केंद्रीय मंत्री और बिहार के कद्दावर नेताओं में से एक गिरिराज सिंह इस सीट से चुनाव मैदान में उतरेंगे। आपको बता दें कि गिरिराज सिंह पिछली बार नवादा सीट से चुनाव जीते थे, लेकिन इस बार बिहार एनडीए में सीट बंटवारे के बाद यह सीट रामविलास पासवान की पार्टी (लोजपा) के खाते में चली गई ऐसे में भाजपा गिरिराज सिंह को बेगूसराय भेज रही है। बेगूसराय लोकसभा सीट पर कुल मतदाताओं की संख्या 17,78,759 है जिसमें पुरुष मतदाताओं की संख्या 8,28,874 और महिला मतदाताओं की संख्या 9,49,825 हैं। इस संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत बिहार विधानसभा की 7 सीटे आती हैं-
1= बेगूसराय
2= मटिहानी
3= तेघड़ा
4= साहेबपुर कमाल
5= बछवारा
6= चेरिया बरियारपुर
7= बखरी (सुरक्षित)

बेगूसराय के सियासी सफर पर एक नजर-

सन 1952 में हुए देश के पहले आम चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मथुरा प्रसाद मिश्रा ने बेगूसराय लोकसभा सीट से जीतकर पहले सांसद बनने का गौरव प्राप्त किया। मथुरा प्रसाद मिश्रा लगातार तीन बार 1952, 1957, 1962 में कांग्रेस की सीट पर इस लोकसभा सीट पर जीत दर्ज किया। 1967 में हुए आम चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के उम्मीदवार योगेंद्र शर्मा ने यहां से जीत दर्ज की और संसद पहुंचे। लेकिन अगले ही चुनाव में फिर से कांग्रेस के श्याम नंदन मिश्रा ने इस सीट को अपने कब्जे में ले लिया। श्याम नंदन मिश्रा 1977 में हुए आम चुनाव में एक बार फिर से जनता पार्टी के टिकट पर सांसद चुने गए। उसके बाद लगातार दो बार क्रमशः 1980,1984 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कृष्णा शाही यहां से सांसद चुने गए। जनता दल के ललित विजय सिंह ने 1989 में हुए आम चुनाव में इस सीट से जीत दर्ज किया। 1991 में हुए का आम चुनाव में कांग्रेस की सीट पर एक बार फिर से कृष्णा शाहीे जीत का परचम लहराने में कामयाब रहे। उसके बाद 1996 में रमेंद्र कुमार निर्दलीय चुनाव जीत कर लोकसभा पहुंचे, लेकिन फिर 1998 में हुए चुनाव में कांग्रेस के राजो सिंह ने एक बार फिर से कांग्रेस के कब्जे में ले लिया। राष्ट्रीय जनता दल के राजवंशी मेहतौ ने 1999 में इस सीट को कांग्रेस से छीन लिया। इसके बाद जनता दल यूनाइटेड से लगातार राजीव रंजन सिंह और डॉक्टर मोनाजीर हसनइस लोकसभा से सांसद निर्वाचित हुए। 2014 में भाजपा के भोला सिंह ने मोदी लहर में संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद पहुंचे और पहली बार इस सीट पर भाजपा का खाता खोला।

कौन बनेगा बेगूसराय का बादशाह-

देशभर में हो रही सियासी चर्चाओं के बीच बिहार का बेगूसराय लोकसभा सीट खासी सुर्ख़ियों में है। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को यहां से अपना उम्मीदवार बनाया है और वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर बिहार के कद्दावर नेता गिरिराज सिंह इस लोकसभा क्षेत्र से अपनी किस्मत को आजमाएंगे। आरजेडी ने इस लोकसभा क्षेत्र से तनवीर हसन को मैदान में उतारा है। आपको बता दें कि इस लोकसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा भूमिहार वोटर हैं जिनकी संख्या लगभग 5 लाख है, जबकि यादव और मुसलमान वोटों की संख्या दो-दो लाख है। पिछले लोकसभा चुनावों पर अगर एक नजर दौड़ाएं तो यह पता चलता है कि सिर्फ दो सांसदों को छोड़कर सारे भूमिहार सांसद चुने गए हैं, हालांकि इनकी पार्टियां अलग अलग रही। यहां की राजनीति भूमिहार समाज के इर्द-गिर्द ही घूमती हुई नजर आती है। लोकसभा के अंतर्गत आने वाली 7 विधानसभा सीटों में से 3 भूमिहार बहुल विधानसभा है, और शायद यही वजह है कि सीपीआई इसे कन्हैया कुमार के लिए सुरक्षित मानकर चल रही है। लेकिन इस बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भूमिहार समाज कन्हैया को अपना नेता बनाएगी या फिर गिरिराज सिंह को ही मिलेगा भूमिहारों का आशीर्वाद।

रिपोर्ट- विनोद कुमार गुप्ता, सत्यम राय

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