उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ अपने खास नजाकत और तहजीब के लिए जाना जाता है, देश की हाई प्रोफाइल लोकसभा सीटों में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सीट का भी नाम आता है. गोमती के किनारे पर बसे लखनऊ को नवाबों का शहर कहा जाता है. मान्यताओं की मानें तो भगवान राम केे छोटे भाई लक्ष्मण ने बसाया था। यहां की दशहरी आम और चिकन की कढ़ाई मशहूर है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक कर्मभूमि रही है. आपको बता दें कि इस सीट पर सुबे कि दो बड़ी सियासी पार्टियां सपा और बसपा ने अभी तक यहां अपना खाता तक नहीं खोला है। इस सीट पर 1991 से लगातार बीजेपी का कब्जा है. मौजूदा समय में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह लखनऊ से सासंद है। 2011 की जनगणना के अनुसार जिले की कुल आबादी 45.89 लाख है,जिनमे पुरुषों की आबादी 23.94 लाख और महिलाओं की आबादी 21.95 लाख है। 2011 की जनगणना के अनुसार लखनऊ की कुल आबादी की 71.1 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दुओं की भागीदारी है। इसके बाद 26.36 प्रतिशत मुस्लिम हैं। इसके बाद बाकी अन्य हैं. अनुसूचित जाति 14.3% हैं तो अनुसूचित जनजाति की 0.2%. इसी इस जिले में सवर्ण वोटर भी करीब 18 प्रतिशत हैं. ओबीसी मतदाता 28 फीसदी और मुस्लिम मतदाता करीब 18 फ़ीसदी हैं.चुनाव आयोग की 2009 की रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ में 16.53 लाख मतदाता है जिनमे महिला मतदाताओं की संख्या 7.63 लाख और पुरुष मतदाताओं की संख्या 8.89 लाख है।लखनऊ संसदीय सीट में पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं-
1= लखनऊ पूर्वी
2= लखनऊ पश्चिम
3= लखनऊ उत्तरी
4= लखनऊ मध्य
5= लखनऊ कैंट
एक नजर लखनऊ के राजनीतिक पृष्ठभूमि पर-
अब तक संसदीय सीट पर हुए लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 7 बार बीजेपी और 6 बार कांग्रेस ने जीत हासिल किया है. इसके अलावा जनता दल, भारतीय लोकदल और निर्दलीय ने एक-एक बार जीत दर्ज की है।1952 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से शिवराजवती नेहरू जीतकर पहली बार सांसद बनने का गौरव हासिल किया. इसके बाद कांग्रेस ने लगातार तीन बार जीत हासिल की, लेकिन 1967 में हुए आम चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार आनंद नारायण ने जीत दर्ज किया. इसके बाद 1971 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस की शीला कौल सांसद बनी.आपातकाल के ठीक बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में हेमवती नंदन बहुगुणा भारतीय लोकदल से जीतकर संसद पहुंचे. हालांकि 1980 में कांग्रेस ने एक बार फिर शीला कौल को यहां से चुनावी मैदान में उतारा और उन्होंने जीत दर्ज किया. वह 1984 में चुनाव जीतकर तीसरी बार सांसद बनने में कामयाब रहीं. 1989 में कांग्रेस की हाथों से जनता दल के मानधाता सिंह ने यह सीट ऐसा छीना कि फिर दोबारा कांग्रेस यहां से वापसी नहीं कर सकी. 90 के दशक में बीजेपी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ संसदीय सीट पर जीतकर जीत का ऐसा सिलसिला शुरू किया जो आज तक नहीं थमा। पिछले सात लोकसभा चुनाव से बीजेपी लगातार जीत दर्ज कर रही है. अटल बिहारी वाजपेयी लगातार पांच बार इस संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए. इसके बाद 2009 में लालजी टंडन को बीजेपी ने मैदान में उतारा तो उन्होंने जीत दर्ज की. इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नवाबों के शहर लखनऊ से अपनी किस्मत आजमाई और उन्होंने कांग्रेस की रीता बहुगुणा को करारी मात देकर लोकसभा पहुंचे।
क्या इस बार खुलेगा गठबंधन का खाता-
आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ लोकसभा सीट पर आज तक प्रदेश की दो बड़ी पार्टियों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का खाता तक नहीं खुला है। मिशन 2019 के लिए इन दोनों दलों ने एक साथ मिलकर चुनावी रण क्षेत्र में उतरने का ऐलान किया है, लेकिन यह सीट किसके पाले में जाएगी और कौन बनेगा गठबंधन का उम्मीदवार इसका अभी तक इंतजार है। वहीं दूसरी तरफ यह सीट 1991 से ही भाजपा के कब्जे में है। इस संसदीय सीट से वर्तमान सांसद और देश के केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को एक बार फिर से पार्टी ने उम्मीदवार घोषित किया है। ऐसे में देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस इस सीट पर अपना वनवास खत्म कर पाएगी या गठबंधन खाता खोलने में कामयाब होगा, या फिर एक बार फिर से लखनऊ भगवा रंग में रंगने वाला है।
विशेष रिपोर्ट- विनोद कुमार गुप्ता, सत्यम राय

