वाराणसी (ब्यूरो) 2019 के चुनावों की घोषणा होते ही देश में सियासी सुगबुगाहट तेज हो गई हैं, जनता की नजर एक बार फिर से देश के सबसे वीआईपी सीट बनारस पर आ टिकी है। कुछ दिन पहले तक सियासत के गलियारों में यह भी अटकलें लगाया जा रहा था कि नरेंद्र मोदी इस बार सीट को छोड़ कर किसी दूसरे सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। लेकिन भाजपा ने अपनी लिस्ट जारी करते हुए इन सभी सियासी अटकलों पर पूर्ण विराम लगा दिया। बनारस लोकसभा सीट से एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी ही भाजपा के उम्मीदवार होंगे।ऐसे में सवाल ये है कि क्या 2019 का आम चुनाव भी मोदी लहर से प्रभावित होंगे? क्या बीजेपी अकेले दम पर एक बार फिर से बहुमत के जादुई आंकड़े को पार कर पाएगी? क्या कांग्रेस अपना पिछला रिकार्ड तोड़ पाएगी? वहीं वर्तमान राजीनित में अपनी अहमियत लगभग खो चुकी क्षेत्रिय पार्टियों का क्या होगा विशेषकर बनारस में। ऐसी रोचक स्थिति में इस सीट का गणित और इतिहास दोनों को समझने की जरूरत है।
काशी के रूप में वर्णित वाराणसी या बनारस शहर भारत की समृद्ध विरासत को अपने आप में संजोये हुए है। यह प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति, दर्शन, परंपराओं और आध्यात्मिक आचरण का एक आदर्श सम्मिलन केंद्र रहा हैं, और आज देश का राजनीतिक केंद्र बिंदु बना हुआ है। सुबे की सियासत पर विशेष असर डालने वाली इस सीट में यूपी विधानसभा की 5 सीटें आती है-
1= रोहनिया विधानसभा
2= वाराणसी उत्तरी विधानसभा
3= वाराणसी दक्षिणी विधानसभा
4= वाराणसी कैंट विधानसभा
5= सेवापुरी विधानसभा
एक नजर वाराणसी लोकसभा क्षेत्र के सियासी सफर पर -
देश में 1951-52 में पहली बार लोकसभा चुनाव हुए थे, तब वाराणसी जिले में लोकसभा की 3 सीटें- बनारस मध्य, बनारस पूर्व और बनारस-मीरजापुर थीं, तब वाराणसी लोकसभा सीट को बनारस मध्य लोकसभा सीट कहते थे, 1951 में बनारस मध्य से कांग्रेस के रघुनाथ सिंह जीते. तब उन्होंने सोसलिस्ट पार्टी के विश्वनाथ शर्मा को हराया था, वहीं 1957 के लोकसभा चुनाव में बनारस मध्य का नाम बदलकर वाराणसी कर दिया गया. 1957 और 1962 में कांग्रेस के रघुनाथ सिंह लगातार तीसरी बार सांसद बने।
1967 में सीपीएम के सत्य नारायण सिंह जीतें और कांग्रेस के रघुनाथ सिंह हार गए. वहीं एक बार फिर 1971 में कांग्रेस के राजाराम शास्त्री सांसद बने। 1977 में कांग्रेस विरोधी लहर में भारतीय लोकदल के चन्द्र शेखर सांसद बने जो बाद में देश के पीएम भी बने और इस चुनाव में कांग्रेस के राजाराम शास्त्री हार गए.1980 में हुए आम चुनाव में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कमलापति त्रिपाठी ने कांग्रेस को जीत दिलाई। आपको बता दें कि कमलापति त्रिपाठी उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. 1984 में एक बार फिर कांग्रेस के श्यामलाल यादव सांसद बने. वहीं 1989 में जनता दल से पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र अनिल कुमार शास्त्री जीते.इस सीट पर 1991 से 1999 तक लगातार चार बार बीजेपी के सांसद चुने गए. 1991 में शिरीष चंद्र दीक्षित, फिर लगातार तीन बार 1996,1998 और 1999 में शंकर प्रसाद जायसवाल यहां से सांसद बने. 2004 में फिर से कांग्रेस के राजेश मिश्रा ने यहां अपना परचम लहराया।2009 में बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी इलाहाबाद से वाराणसी चुनाव लड़ने आए. वहीं सपा ने बाहुबली नेता अजय राय और बसपा ने बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी को चुनाव लड़ाया, लेकिन बीजेपी सीट जीतने में कामयाब रही. 2014 में नरेन्द्र मोदी वाराणसी से चुनाव जीतकर पीएम बने. वहीं आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल दूसरे नंबर पर रहे।
क्या गठबंधन बिगाड़ पाएगा मोदी का मिजाज-
सुबे की दो बड़ी सियासी पार्टियां सपा और बसपा एक साथ मिलकर प्रदेश में भाजपा को कड़ी टक्कर देने के मूड में है। गठबंधन 2+2=4 के फार्मूले पर चुनावी रण क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन सियासी पंडितों की मानें तो राजनीति में 2+2=4 नहीं होता हैं। इसके बावजूद गठबंधन पिछले आम चुनाव में मिले मतों की अंकगणित पर बनारस का इतिहास लिखने की ताल ठोक रहे हैं। आपको बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी को कुल 581022 मत मिले जबकि सपा और बसपा को मिलाकर मात्र 105870 मत मिले। अगर इसमें कांग्रेस का भी मत जोड़ दिया जाए तब भी 181484 ही होता है। हालांकि प्रदेश में हुए महागठबंधन में कांग्रेश नहीं है। फिर भी फ्रेंडली फाइट की बातें हो रही है। जिसमें कुछ सीटों पर भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस गठबंधन का साथ देगी। हालांकि इस सीट पर अब तक ना गठबंधन ने और ना ही कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी का ऐलान किया, ऐसे में प्रत्याशियों की घोषणा भी चुनावी समीकरण बदल सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ गठबंधन किसे अपना प्रत्याशी के रूप में इस लोकसभा में उतारती है और वो प्रधानमंत्री मोदी को कितना टक्कर दे पाएंगे।
रिपोर्ट- विनोद कुमार गुप्ता, सत्यम राय

