वाराणसी (व्यूरो) - आज सर्वत्र घर,सड़क और कार्यस्थल पर हिंसा से मुक्ति के लिए महिलाओं का संघर्ष नज़र आता है, महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध हिंसा की घटनाएं समाज में महिलाओं के असुरक्षित होने का पैमाना है और ये असमानता को भी बनाये रखती हैं।जब तक महिलायें भय में जीवन गुजारेगी, वे कभी अपने समुदाय के सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक विकास में पूरी तरह भाग नही ले सकेंगी।
ऐसा नही है की किसी एक वर्ग विशेष या समुदाय की महिलाएं ही भेदभाव और अत्याचार का शिकार हों वल्कि प्रत्येक महिला की यही कहानी है।हालांकि उसकी निष्ठा के विरुद्ध अतिक्रमण की डिग्री में अंतर हो सकता है।स्वास्थ्य सूचकांक, शिक्षा सूचकांक, एक बच्ची की जीवन सम्भाव्यता की दर,पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों का कम होता हुआ अनुपात,खाप पंचायतों द्वारा किये जाने वाले अन्याय,दहेज हत्याएं, घरेलू हिंसा की बढ़ती हुई घटनाएं, विच हंटिंग,यौन उत्पीड़न और बड़े पैमाने पर किसी भी साम्प्रदायिक /जातीय हिंसा में महिलाओं को निशाना बनाया जाना, कार्य के स्थान पर आर्थिक शोषण आदि असंख्य मुद्दे हैं, जिनसे निपटने की जरूरत है।पित्रसत्ता की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि यह सत्ता और शासन व्यवस्था का लगभग पर्याय बन गयी है।
किसी समुदाय को बदनाम करने हेतु या सम्बद्ध समुदायों के सम्मान की रक्षा करने के नाम पर विघटनकारी ताकतों नें बहुत सोंचे समझे तरीके से महिलाओं को निशाना बनाया है परिणामतः महिलाओं को घरों की सीमाओं में कैद रहने के लिए मजबूर किया गया।इस तरह महिलाओं को दोहरा उत्पीड़न सहन करना पड़ता है।कठुआ और उन्नाव बलात्कार के मामलों पर सरकार की प्रतिक्रिया से महिलाओं तथा नागरिकों के तौर पर हम सभी भयभीत हैं।कानून के वर्चस्व और समानता के प्रति बुनियादी संवैधानिक प्रतिबद्धता में निरंतर गिरावट आ रही है। बलात्कार की इन घटनाओं को जिस तरह राजनीति और धर्म से जोड़ा जा रहा है ,उसे भी स्वीकार नही किया जा सकता ।हद तो यह है कि बलात्कार को लोगों को साम्प्रदायिकता के आधार पर बांटने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। उक्त विचार अमन की बाते यात्रा के स्वागतं में रविवार को आयोजित परिचर्चा में उभर कर आया ।
डॉ. आनन्द प्रकाश तिवारी अध्यक्ष प्रबुद्ध प्रकोष्ठ-समाजवादी पार्टी ने अंबेडकर पार्क में अमन यात्रा दल का स्वागतं करते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों से संविधान और अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा हमला हो रहा है ,जिससे सभी महिलाएं प्रभावित हुई हैं।इसमें मुख्यतः अपनी पसंद के कपड़े पहनने ,बोलने,लिखने,खाने तथा चुनने के हमारे अधिकार और वे अधिकार जिन्हें हमनें सख्त और सतत नारीवादी संघर्षो के जरिये प्राप्त किया है।इसके अतिरिक्त नवउदारवादी आर्थिक नीतियों नें न केवल सामान्यतः आम भारतीय महिलाओं को वल्कि दलितों, आदिवासियों तथा इस देश में पहले से वंचित और तिरस्कृत लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया है और उनका कमजोर आर्थिक आधार तबाह हो चुका है।भारतीय संविधान में महिलाओं को बोलने,आने जाने की स्वतंत्रता तथा अपने स्वयं के शरीर पर अधिकार के साथ समानता का अधिकार दिया गया है।विशेष रूप से सामूहिक बलात्कारों सहित देश में महिलाओं के विरुद्ध बढ़ती हुई हिंसा की घटनाओं के संदर्भ में संवैधानिक अधिकारों के लिए आह्वान किये जाने की जरूरत है।
यात्रा दल के नेत्री शहनाज़ कादरी ने "बातें अमन की" अभियान का उद्देश्य भारत में महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों पर होने वाले लक्ष्यबद्ध हमलों के विरुद्ध संघर्ष करना है।आज महिलाओं की स्वतंत्रता पर न केवल सीधा हमला किया जा रहा है वल्कि व्यवस्थित रूप से तर्कहीन, अवैज्ञानिक और अलोकतांत्रिक प्रचार के माध्यम से महिलाओं को मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर करने की निरंतर कोशिश की जा रही है।मुसलमानों,दलितों और ईसाइयों पर हमले करके भय और असुरक्षा का एक माहौल तैयार किया जा रहा है।इन हमलों में सबसे ज्यादा महिलाएं ही प्रभावित होती हैं।इस अभियान के माध्यम से हम संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु साथ साथ खड़े होने के लिए महिलाओं और पुरुषों को लामबंद करना तथा और अधिक शांतिपूर्ण, न्यायपूर्ण एवं अहिंसात्मक समाज के निर्माण के लिए अनेक महिला संगठनों और जन-आंदोलनों से जुड़ना तथा उन्हें साथ लाना चाहते हैं।
परिचर्चा से पूर्व विभिन संगठनों द्वारा कारवाँ में शामिल महिलाओं का स्वागत कचहरी स्थित डॉ भीम राव आंबेडकर पार्क में किया गया। आंबेडकर पार्क से एक पदयात्रा रैली विश्वज्योति जनसंचार केंद्र तक निकाली गई जिसमें शामिल लोग महिला सशक्तिकरण एवं हिंसा मुक्त समाज के निर्माण हेतु गीत और नारों द्वारा लोगों को जागरूक कर रहे थे, रैली में महिला कारवां के साथ-साथ स्थानीय संगठनों की महत्वपूर्ण भागीदारी रही।
इस अभियान का आयोजन साझा संस्कृति मंच,मानवाधिकार जन निगरानी समिति,नागरिक प्रयास मंच,आल इंडिया सेक्युलर फोरम,ऐपवा सहित अन्य अनेक संगठनों द्वारा किया गया।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से प्रो.दीपक मलिक, परन अमितावा, तारामनी साहू, शहनाज़ क़ादरी, थिलागवती, अंजुमन शेख, देव देसाई, सुरेश खैरनार, डॉ मोहम्मद आरिफ, वल्लभाचार्य पांडेय, श्रुति नागवंशी, राजकुमार गुप्ता, कुसुम वर्मा, सतीश सिंह, हाजी इश्तियाक अंसारी, फादर आनंद, जागृति राही, शबाना खान, अनूप श्रमिक, एस पी राय, मुनीज़ा रफीक खान, मनीष शर्मा, कामता प्रसाद, क़ैसर जहां, शमा परवीन, सीमा चौधरी आदि मौजूद रहे।
वाराणसी ब्यूरो अब्दुल्ला वारसी


