Left Post

Type Here to Get Search Results !

बलिया की आजादी का आंदोलन: पत्रकार रमेश कुमार जायसवाल की जुबानी


बलिया एक प्राचीन शहर है, भारत के कई महान संत और साधु जैसे जमदग्नि, वाल्मीकि, भृगु, दुर्वासा आदि के आश्रम बलिया में थे। बलिया प्राचीन समय में कोसल साम्राज्य का एक भाग था। यह भी कुछ समय के लिए बौद्ध प्रभाव में आया था। पहले यह गाजीपुर जिले का एक हिस्सा था, लेकिन बाद में यह जिला हो गया।
अगस्त का महीना हो, गंगा एवं घाघरा दोनों नदियां अपनी सीमाएं तोड़ने को आतुर हों और ऐसे मौके पर बलिया की बगावत की चर्चा न हो तो यह बलिया के साथ अन्याय होगा। और बलिया ने न तो कभी अन्याय बर्दास्त किया है और न ही आगे करेगा। ऐसा हो भी क्यों नहीं, आखिर इसी ऋषि मुनियों की धरती बलिया ने महर्षि बाल्मीकि को रामायण की रचना के लिए प्रेरित किया तो दर्दर ऋषि एवं भृगु मुनि ने इस धरती को अपने तपोबल से सींचा है। रही बात बलिया के बगावत की है तो उसे 19 अगस्त 1942 को पूरे देश ने देखा। जी हां, बलिया के इसी बगावत ने आजादी के आंदोलन की कई तारीखें लिखी, देश वासियों को जुल्म एवं अन्याय के खिलाफ बगावत सिखाया और खुद बागी बलिया बन गया। गंगा एवं घाघरा के बीच बसी बलिया हजारों साल पुरानी सभ्यता एवं संस्कृतियों को समेटे हुए हैं। कौशल राज से शुरू हुए बलिया के इतिहास के विवरण कई पौराणिक एवं ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलते हैं। तीखे तेवर, फौलादी इरादे एवं मातृभूमि पर मर मिटने का जज्बा बलिया वासियों को विरासत में मिली है और इसे ही समूचे देश ने बगावत का नाम दिया है। 1857 की मेरठ क्रांति तो आप सभी को याद ही होगी। बलिया के ही बीर सपूत मंगल पांडे ने इस क्रांति का आगाज कर अंग्रेजों की चूलें हिला दी थी। आजादी का पहला शंखनाद मेरठ में हुआ ही था कि पूरा देश आजादी को जोश में उबलने लगा। बलिया में बाबू जगन्नाथ सिंह ने ब्रिटेन के प्रिंस का ताज अपने जूते के फीते में बांध कर बगावत की मशाल उठा ली। इसके बाद चाहे असहयोग आंदोलन हो या झंडा सत्याग्रह या फिर सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह हर जगह बलिया के लोगों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। अगस्त 1942 में महात्मा गांधी, पंडित नेहरु एंव सरदार पटेल आदि बंबई में थे। वहां गांधी जी ने करो या मरो का नारा दिया, लेकिन साथ में यह अपील भी कर दी कि अहिंसा सर्वोपरि है। लेकिन इस बात को बलिया के लोग नहीं समझ पाए कि आखिर अहिंसा के साथ करो या मरो कैसे संभव है। इसे बलिया वालों की नासमझी कह सकते हैं, लेकिन इसी ने बलिया की बागी बना दिया। कब क्या हुआ 9 अगस्त 1942 को बलिया के लोग गांधी जी का मंतव्य का अर्थ ढूंढने के लिए बेचैन थे। इसी बीच बंबई में गांधी, नेहरु एवं पटेल समेत पचास से अधिक लोगों की गिरफ्तारी हो गई। यह खबर जंगल की आग की तरह बलिया पहुंच गई, लोग आर पार की लड़ाई की तैयारी में लग गए। 10 अगस्त की सुबह होने से पहले ही पूरा बलिया जाग गया। सूर्य की पहली किरण के साथ ही भारत माता की जय के नारों से पूरा बलिया गूंज उठा और इसी के साथ बलिया में जनांदोलन शुरू हो गया। 11 अगस्त को लोग जुलूश लेकर मुख्यालय पहुंच गए। लोगों का हुजूम एवं उनके आक्रोश को देखते हुए बलिया के तत्कालीन कलेक्टर जगदीश्वर निगम डर गए और उन्होंने ब्रिटानिया हुकुमत को बलिया की आजादी की सिफारिश कर दी। इस बीच पुलिस ने आजादी के कई दिवानों को गिरफ्तार कर लिया। 12 अगस्त को पूरे जिले में बगावत चरम पर थी। कोई नेता नहीं था, लेकिन सभी बागी थे। जुलूश निकल रहा था, इसमें कलेक्टर जगदीश्वर निगम के बेटे शैलेश निगम भी शामिल थे। इसी बीच पुलिस ने एक बार फिर जुलूश में से 30 छात्रों को उठा लिया और नंगा कर यातानाएं दी। 13 अगस्त को बलिया वासियों ने रेलवे स्टेशन पर कब्जा कर लिया, वहीं महिलाओं ने कचहरी पर कब्जा करते हुए कचहरी की मुंडेर पर तिरंगा फहरा दिया। उधर, क्रांतिबीरों ने टाउन हाल पर कब्जा करते हुए अंग्रेजी झंडे को उखाड़ फेंका। 14 अगस्त को क्रांतिबीरों ने डाकघर पर कब्जा कर सारा खजाना एवं कागजात लूट लिए। इसके बाद शहर कोतवाल ने भीड़ पर घोड़े दौड़ाए तो लोगों ने इस कदर मुकाबला किया भारी फोर्स के बीच वह खुद अपनी जान की भीख मांगता नजर आया। 15 अगस्त को आंदोलन के लिए बलिया आ रहे छात्रों के समूह को पुलिस ने स्टेशन पर ही गिरफ्तार कर लिया। ऐसे में आक्रोशित छात्रों ने पुलिस स्टेशन पर ही कब्जा कर उसे आग के हवाले कर दिया। 16 अगस्त को छात्रों ने रेलवे स्टेशन में आग लगा दी और एक ट्रेन को अगवा कर उसे आजाद ट्रेन के नाम से चला दिया। 17 अगस्त को जिले भर में चरम पर पहुंचे बगावत ने तहसीलों को अपने कब्जे में ले लिया। आज के आंदोलन में बच्चों से लेकर बुजुर्गो तक एवं मजदूरों से लेकर व्यापारियों तक सभी ने अपनी अहम भूमिका निभाई। 18 अगस्त को लोगों का जोश उफान पर था। प्रशासन एवं पुलिस के लोग खुद अपने बचाव की जगह तलाश रहे थे। इसी बीच बैरिया में खून संघर्ष हुआ और 20 क्रांतिबीर पुलिस की गोली से शहीद हो गए। फिर क्या था, लाठी, डंडे, लेकर थाने पर पहुंचे लोगों ने बैरिया थाने पर कब्जा करते हुए थानेदार समेत सभी को हवालात में बंद कर दिया और थाने पर तिरंगा फहरा दिया। 19 अगस्त की सुबह बलिया के लोग आखिरी एवं निर्णायक जंग के लिए तैयार थे। सुबह होने से पहले जिले भर से लोग आजादी की सांस लेने के लिए बेचैन हो उठे। देखते ही देखते चारो ओर से लोग बलिया को आजाद करने के लिए निकल पड़े। इसकी भनक कलेक्टर जगदीश्वर निगम को लगी तो लोगों के पहुंचने से पहले वह खुद ही जेल पहुंच कर क्रांतिबीरों के लिए दरवाजे खोल दिया। उन्होंने चित्तूपांडे से आग्रह किया कि वह बलिया की बगावत के सामने घुटने टेक रहे हैं। इसी के साथ उन्होंने अपना पद छोड़ दिया और बलिया 19 अगस्त 1942 को देश में सबसे पहले आजाद हो गया।

सब एडिटर रमेश जयसवाल की कलम से-

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.
image image image image image image image

Image   Image   Image   Image  

--- Top Headlines ---