सिकन्दरपुर में मिशन-2027 की आहट के साथ तेज हुई भाजपा के टिकट की चर्चा, पुराने राजनीतिक अनुभव बनाम संगठनात्मक पकड़ और चुनावी समीकरणों की होगी बड़ी परीक्षा, सिकन्दरपुर की राजनीति में पिछले तीन दशकों में हुए हैं कई बड़े राजनीतिक बदलाव
![]() |
| खबरें आजतक Live |
मुख्य अंश (toc)
लगभग आधा दर्जन संभावित नामों की चर्चा
सिकन्दरपुर (बलिया)। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच सिकन्दरपुर विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियां धीरे धीरे तेज होती दिखाई दे रही हैं। समाजवादी पार्टी के कब्जे वाली इस सीट पर भाजपा के भीतर टिकट को लेकर संभावित दावेदारों की चर्चा ने स्थानीय सियासत का तापमान बढ़ा दिया है। इसी बीच पूर्व विधायक एवं पूर्व वन मंत्री राजधारी सिंह की लगातार क्षेत्र में सक्रियता ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भाजपा इस बार पुराने राजनीतिक अनुभव और क्षेत्रीय पहचान वाले राजधारी सिंह पर दांव लगाएगी? जून 2026 में प्रकाशित एक स्थानीय राजनीतिक विश्लेषण में सिकन्दरपुर से भाजपा टिकट की प्रमुख दावेदारी में पूर्व मंत्री राजधारी सिंह, पूर्व विधायक संजय यादव और पूर्व विधायक भगवान पाठक के नाम सामने आए थे। उसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि लगभग आधा दर्जन संभावित नामों की चर्चा है और एनडीए के किसी घटक दल को सीट दिए जाने की संभावना की भी राजनीतिक चर्चा चल रही हैं।
राजधारी सिंह सिकन्दरपुर की राजनीति का पुराना चेहरा
राजधारी सिंह सिकन्दरपुर की राजनीति के उन नेताओं में हैं जिनका राजनीतिक सफर कई दशक पुराना है। उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने 1989 में सिकन्दरपुर विधानसभा सीट से जनता दल (जनता पार्टी) के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता। इसके बाद 1996 में उन्होंने फिर सिकन्दरपुर से चुनाव जीता। 1996 में वे सोशलिस्ट एक्शन पार्टी के उम्मीदवार के रूप में विजयी रहे और उन्हें 44,784 मत मिले थे। उनका राजनीतिक प्रभाव केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहा। राजधारी सिंह उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार में वन मंत्री भी रहे। यानी सिकन्दरपुर की राजनीति में राजधारी सिंह के पास विधानसभा का अनुभव, मंत्री पद का अनुभव और लंबा राजनीतिक सार्वजनिक जीवन तीनों मौजूद हैं।
दो बार विधायक रहे, फिर बदले राजनीतिक समीकरण
सिकन्दरपुर की राजनीति में पिछले तीन दशकों में कई बड़े राजनीतिक बदलाव हुए हैं। 1989 में राजधारी सिंह विधानसभा पहुंचे, 1991 में कांग्रेस के मार्कंडेय, 1993 में दीनानाथ चौधरी और 1996 में फिर राजधारी सिंह विजयी हुए। इसके बाद 2002 में जियाउद्दीन रिजवी, 2007 में भगवान पाठक, 2012 में फिर जियाउद्दीन रिजवी और 2017 में भाजपा के संजय यादव विधायक बने। 2022 में जियाउद्दीन रिजवी ने भाजपा के संजय यादव को हराकर सिकन्दरपुर विधानसभा की सीट को वापस सपा के खाते में डाल दिया। यही इतिहास बताता है कि सिकन्दरपुर में किसी एक दल या एक चेहरे का स्थायी वर्चस्व नहीं रहा है। यहां चुनावी समीकरण समय के साथ बदलते रहे हैं।
भाजपा में आने के बाद फिर सक्रिय हुई राजनीति
राजधारी सिंह ने बाद के दौर में भाजपा का दामन थामा। 2015 की एक रिपोर्ट में पूर्व मंत्री राजधारी सिंह के भाजपा में शामिल होने की जानकारी प्रकाशित हुई थी। भाजपा में आने के बाद भी उनका राजनीतिक संपर्क और क्षेत्रीय सक्रियता बनी रही। पिछले वर्षों में वे सिकन्दरपुर और आसपास के क्षेत्रों से जुड़े जनहित के मुद्दों को लेकर अधिकारियों एवं सरकार के स्तर पर सक्रिय दिखाई दिए हैं। मार्च 2025 में उन्होंने ऊर्जा मंत्री से मुलाकात कर पुरुषोत्तम पट्टी में विद्युत उपकेंद्र की मांग उठाई थी। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने सिकन्दरपुर और मनियर उपकेंद्र के बीच क्षेत्र की विद्युत समस्या तथा प्रस्तावित उपकेंद्र से जुड़ा मुद्दा रखा था।
2026 में भी क्षेत्र में लगातार मौजूदगी
मिशन-2027 के दौर में राजधारी सिंह की क्षेत्रीय सक्रियता खास तौर पर चर्चा में है। जुलाई 2026 में सिकन्दरपुर के महावीरी झंडा जुलूस सहित विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों में वे भाजपा के अन्य नेताओं के साथ दिखाई दिए। हाल ही में भाजपा के नवनियुक्त जिला प्रभारी प्रेमचन्द मिश्रा के बलिया प्रथम आगमन के दौरान भी राजधारी सिंह विभिन्न स्वागत कार्यक्रमों में मौजूद रहे। सिकन्दरपुर क्षेत्र में बस स्टैंड चौराहा से लेकर नगरा मोड़, करमौता, नवानगर, नवरतनपुर और माल्दह चट्टी तक हुए स्वागत कार्यक्रमों में उनका नाम प्रमुख रूप से दर्ज किया गया है। यही सक्रियता अब स्थानीय राजनीतिक हलकों में एक सवाल को जन्म दे रही हैं। क्या यह केवल संगठनात्मक सक्रियता है या मिशन-2027 की टिकट दावेदारी को मजबूत करने की तैयारी?
जानें टिकट की रेस में कौन-कौन?
1- राजधारी सिंह- अनुभव सबसे बड़ा हथियार
राजधारी सिंह की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी उनका लंबा अनुभव है। वे दो बार सिकन्दरपुर से विधायक रह चुके हैं और प्रदेश सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। यही कारण है कि उनकी दावेदारी को महज एक सामान्य दावेदारी के रूप में नहीं देखा जा सकता। लेकिन दूसरी तरफ उनकी चुनौती भी कम नहीं है। पार्टी के भीतर अब नई पीढ़ी के चेहरे, संगठनात्मक सक्रियता और पिछले चुनावों का प्रदर्शन भी टिकट के फैसले में महत्वपूर्ण हो सकता है।
2- संजय यादव- भाजपा की पिछली जीत का चेहरा
पूर्व विधायक संजय यादव इस रेस के सबसे महत्वपूर्ण नामों में हैं। वे 2017 में भाजपा के टिकट पर सिकन्दरपुर से विधायक चुने गए थे और उन्होंने जियाउद्दीन रिजवी को 23,548 मतों के अंतर से हराया था। 2022 में हालांकि समीकरण बदल गए और जियाउद्दीन रिजवी ने 75,446 वोट हासिल कर संजय यादव को 11,855 वोटों से पराजित किया। भाजपा को 63,591 वोट मिले। संजय यादव का पक्ष यह है कि वे इस सीट से भाजपा को एक बार जीत दिला चुके हैं और संगठनात्मक स्तर पर भी उनका बड़ा अनुभव है। हालिया राजनीतिक व मीडिया रिपोर्टों में उन्हें प्रमुख दावेदारों में शामिल किया गया है।
3- भगवान पाठक- संगठन व राजनीतिक अनुभव का दूसरा चेहरा
पूर्व विधायक भगवान पाठक भी भाजपा के संभावित दावेदारों में चर्चा में हैं। वे 2007 में सिकन्दरपुर से बसपा के टिकट पर विधायक चुने गए थे और बाद में भाजपा में शामिल हुए। भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति में भी उनका नाम रहा है। इस लिहाज से उनके पास भी क्षेत्रीय राजनीतिक अनुभव के साथ संगठनात्मक पृष्ठभूमि है। जून 2026 की राजनीतिक व मीडिया रिपोर्ट में राजधारी सिंह और संजय यादव के साथ भगवान पाठक को प्रमुख दावेदारों में रखा गया था।
लेकिन असली खेल सिर्फ भाजपा के टिकट का नहीं
सिकन्दरपुर की चुनावी राजनीति में इस बार एक और बड़ा सवाल है। क्या यह सीट भाजपा के पास ही रहेगी या एनडीए के किसी सहयोगी दल को जाएगी? जून 2026 की एक स्थानीय राजनीतिक रिपोर्ट में ऐसी चर्चा का उल्लेख किया गया था कि सिकन्दरपुर सीट एनडीए के दूसरे घटक दल को भी दी जा सकती है। उसी रिपोर्ट में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के संभावित स्थानीय नामों की चर्चा भी की गई थी। हालांकि इसे अभी राजनीतिक चर्चा व संभावना के रूप में ही देखा जाना चाहिए। सीट बंटवारे को लेकर कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। अगर सीट भाजपा के पास रहती है तो राजधारी सिंह, संजय यादव और भगवान पाठक जैसे नेताओं के बीच टिकट की प्रतिस्पर्धा दिलचस्प होगी। लेकिन अगर सीट सहयोगी दल के खाते में चली जाती है तो पूरी तस्वीर ही बदल सकती है।
सपा के जियाउद्दीन रिजवी के सामने भाजपा की चुनौती
सिकन्दरपुर में भाजपा की टिकट राजनीति को समझने के लिए 2022 के नतीजे सबसे महत्वपूर्ण हैं। उस चुनाव में सपा के जियाउद्दीन रिजवी को 75,446 वोट यानी 42.75 प्रतिशत वोट मिले, जबकि भाजपा के संजय यादव को 63,591 वोट यानी 36.03 प्रतिशत वोट मिले। जीत का अंतर 11,855 वोट रहा। इसलिए भाजपा के सामने सिर्फ उम्मीदवार चुनने की चुनौती नहीं है। उसके सामने सवाल यह भी है कि कौन सा चेहरा 2022 में छूटी सीट को वापस भाजपा के खाते में लाने के लिए सबसे मजबूत चुनावी आधार तैयार कर सकता है?
राजधारी सिंह की दावेदारी कहां तक मजबूत?
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है। राजधारी सिंह के पास लंबा राजनीतिक अनुभव, दो बार विधायक रहने का रिकॉर्ड, मंत्री पद का अनुभव और वर्तमान में क्षेत्रीय सक्रियता है। यह उनकी दावेदारी के मजबूत पक्ष हैं। लेकिन टिकट का फैसला केवल राजनीतिक वरिष्ठता से नहीं होता। भाजपा को यह भी देखना होगा कि कौन उम्मीदवार संगठन के वर्तमान ढांचे के साथ बेहतर तालमेल रखता है, क्षेत्र में किसकी स्वीकार्यता कितनी है, पिछले चुनावी आंकड़े क्या संकेत देते हैं और पार्टी की व्यापक रणनीति में कौन चेहरा फिट बैठता है। इसलिए राजधारी सिंह की दावेदारी को मजबूत जरूर कहा जा सकता है, लेकिन अभी से उनका टिकट तय मान लेना जल्दबाजी होगी।
सबसे बड़ा सवाल- अनुभव भारी पड़ेगा या संगठन?
यही सिकन्दरपुर की आगामी भाजपा राजनीति का सबसे दिलचस्प प्रश्न है। एक तरफ हैं राजधारी सिंह, जिनके पास पुराना राजनीतिक अनुभव और मंत्री पद की पृष्ठभूमि है। दूसरी तरफ हैं संजय यादव, जो भाजपा को 2017 में यह सीट जीता चुके हैं। तीसरी तरफ हैं भगवान पाठक, जिनके पास विधायक रहने और प्रदेश संगठन से जुड़े रहने का लंबा अनुभव है।
क्या इस बार भाजपा लगाएगी राजधारी सिंह पर दांव?
अभी इसका जवाब किसी के पास नहीं है। लेकिन राजनीतिक संकेत जरूर दिलचस्प हैं। राजधारी सिंह की लगातार क्षेत्रीय सक्रियता, भाजपा के बड़े कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी और जनहित के मुद्दों को लेकर सक्रियता बताती है कि वे सार्वजनिक जीवन में पूरी तरह सक्रिय बने हुए हैं। हालिया राजनीतिक व मीडिया रिपोर्टों ने भी उन्हें सिकन्दरपुर में भाजपा टिकट के प्रमुख दावेदारों में रखा है। अब देखना होगा कि भाजपा नेतृत्व अनुभव, संगठन, सामाजिक समीकरण, चुनावी क्षमता और 2022 की हार के बाद सीट वापस लेने की रणनीति- इनमें किसे कितना महत्व देता है।
इस बार किसका होगा ‘राजतिलक’?
सिकन्दरपुर में फिलहाल किसी एक चेहरे को विजेता मानना राजनीतिक रूप से जल्दबाजी होगी। क्योंकि चुनाव अभी सामने है, भाजपा का उम्मीदवार तय नहीं है और विपक्षी दलों की तस्वीर भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इसलिए फिलहाल ‘राजतिलक’ की कुर्सी खाली है और दावेदार कई हैं। लेकिन एक बात तय है- सिकन्दरपुर में 2027 की लड़ाई केवल भाजपा बनाम सपा नहीं होगी, बल्कि भाजपा के भीतर टिकट की लड़ाई भी चुनावी कहानी का एक बड़ा अध्याय बन सकती है और इसी वजह से सिकन्दरपुर की सियासत में सबसे बड़ा सवाल अब यह नहीं है कि चुनाव कौन जीतेगा? सबसे बड़ा सवाल है भाजपा का कमल लेकर मैदान में उतरेगा कौन? राजधारी सिंह का अनुभव? संजय यादव की पिछली जीत? या भगवान पाठक का संगठनात्मक अनुभव? या फिर कोई ऐसा नया चेहरा, जो अभी चर्चाओं के केंद्र में नहीं है? इस सवाल का जवाब भाजपा नेतृत्व देगा। लेकिन उससे पहले सिकन्दरपुर की सियासत में टिकट की रेस निश्चित रूप से कई नए मोड़ ले सकती है।
अस्वीकरण: यह विश्लेषण उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड और 2026 में प्रकाशित स्थानीय राजनीतिक व मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। टिकट को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। इसलिए ऊपर संभावित दावेदारों और राजनीतिक समीकरणों को दावेदारी/चर्चा के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है।
रिपोर्ट- विनोद कुमार गुप्ता

