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Ballia Breaking: सिकन्दरपुर के सरकारी मवेशी अस्पताल में RCM का दरबार, डॉक्टर बोले- परमिशन नहीं दी, सरकारी अस्पताल या निजी कंपनी का मंच, RCM के कार्यक्रम ने खड़े किए बड़े सवाल, सरकारी परिसर में RCM का कब्जा

टेंट व माइक से सैकड़ों की भीड़… अनुमति किसकी? डॉक्टर बोले ‘सिर्फ पौधारोपण’… RCM बोला डॉ. साहब का आदेश, आखिर कौन बोल रहा है सच, रक्तदान का बोर्ड लगा, डॉक्टरों की टीम गायब, सरकारी परिसर में RCM कार्यक्रम पर उठे सवाल, आखिर सरकारी कैंपस में किसकी मनमानी

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मुख्य अंश (toc)

RCM के बैनर तले बड़ा कार्यक्रम

सिकन्दरपुर (बलिया)। रकारी भवन और उसके परिसर का इस्तेमाल निजी अथवा व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किसकी अनुमति से किया जा सकता है, यह सवाल अब सिकन्दरपुर पशु चिकित्सालय में आयोजित एक कार्यक्रम को लेकर खड़ा हो गया है। आरोप है कि पशु चिकित्सालय परिसर में 16 सितंबर की दोपहर RCM के बैनर तले बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें सैकड़ों महिला-पुरुष शामिल हुए। कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सरकारी परिसर के इस्तेमाल को लेकर कई प्रकार के सवाल उठने लगे हैं। सबसे खास बात यह है कि कार्यक्रम स्थल पर टेंट, तंबू, माइक और अन्य व्यवस्थाएं की गई थीं। साथ ही वहां रक्तदान शिविर से संबंधित बोर्ड भी लगाया गया था। लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक मौके पर कोई चिकित्सकीय टीम मौजूद नहीं थी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि रक्तदान शिविर वास्तव में आयोजित किया जाना था या बोर्ड केवल कार्यक्रम का हिस्सा था?

किसने दी कार्यक्रम की अनुमति?

सरकारी भवन एवं परिसर का उपयोग निर्धारित सरकारी कार्यों से इतर करने के लिए सक्षम स्तर की अनुमति और नियमों का पालन महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिकन्दरपुर पशु चिकित्सालय परिसर में इतने बड़े निजी संगठन के कार्यक्रम के लिए लिखित या मौखिक अनुमति किस अधिकारी ने दी? यदि अनुमति ली गई थी तो वह किस स्तर से मिली और क्या उसकी कोई लिखित प्रति विभागीय रिकॉर्ड में उपलब्ध है? और यदि अनुमति नहीं ली गई थी तो सरकारी परिसर में टेंट, माइक और भीड़ के साथ कार्यक्रम आयोजित होने तक विभागीय स्तर पर इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई?

क्या बोलें पशु चिकित्साधिकारी

मामले में सिकन्दरपुर के पशु चिकित्साधिकारी अनिल राय का बयान भी कई सवाल खड़े करता है। उन्होंने बताया कि उनसे केवल पौधारोपण के लिए कहा गया था। लेकिन यदि चिकित्साधिकारी को केवल पौधारोपण की जानकारी दी गई थी, तो फिर पशु चिकित्सालय परिसर में टेंट, तंबू, माइक और बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति किसने दी? क्या विभाग के किसी सक्षम अधिकारी से अनुमति ली गई थी? यदि नहीं, तो सरकारी परिसर में इतनी बड़ी भीड़ और बाहरी संस्था की गतिविधि कैसे संचालित हुई?

RCM प्रतिनिधि का दावा- डॉ. साहब के आदेश पर हुआ कार्यक्रम

मामले को और दिलचस्प बना रहा है RCM प्रतिनिधि और पशु चिकित्साधिकारी के बयानों में सामने आया विरोधाभास। कार्यक्रम के आयोजक RCM के प्रतिनिधि ने दावा किया कि डॉ. साहब के आदेश पर ही कार्यक्रम आयोजित किया गया था। दूसरी ओर पशु चिकित्साधिकारी अनिल राय इस बात को सिरे से खारिज कर रहे हैं और उनका कहना है कि उन्हें केवल पौधारोपण के लिए कहा गया था। ऐसे में सवाल सीधा हैं आखिर सच कौन बोल रहा है? यदि चिकित्साधिकारी ने कार्यक्रम की अनुमति दी थी तो उसका लिखित आदेश कहां है? और यदि उन्होंने अनुमति नहीं दी थी तो RCM प्रतिनिधि किसके आदेश का हवाला देकर सरकारी परिसर में कार्यक्रम आयोजित करने की बात कह रहे हैं?

विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे चिकित्साधिकारी

मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि चिकित्साधिकारी अनिल राय स्वयं कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद थे। ऐसे में विभागीय जवाबदेही का सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि कार्यक्रम की अनुमति उन्होंने नहीं दी थी तो सरकारी परिसर में आयोजित इस गतिविधि की जानकारी होने के बावजूद वे कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में क्यों मौजूद रहे? क्या उनकी मौजूदगी को कार्यक्रम की मौन स्वीकृति माना जाए या उन्होंने मौके पर ही आयोजकों से अनुमति संबंधी दस्तावेज मांगे थे? इन सवालों का स्पष्ट जवाब विभागीय जांच के बाद ही सामने आ सकता है।

बैनर कुछ और, कार्यक्रम कुछ और?

कार्यक्रम स्थल पर RCM का बैनर लगाया गया था, जबकि पशु चिकित्सालय एक सरकारी परिसर है। इसके अलावा रक्तदान शिविर का बोर्ड भी लगाए जाने की बात सामने आई है। यदि वास्तव में रक्तदान शिविर आयोजित किया जाना था तो पंजीकृत चिकित्सकीय टीम, आवश्यक चिकित्सा व्यवस्था और संबंधित अनुमति/प्रोटोकॉल का पालन हुआ या नहीं, यह भी जांच का विषय होना चाहिए। क्योंकि रक्तदान कोई सामान्य मंचीय गतिविधि नहीं है। यदि रक्तदान शिविर के नाम पर लोगों को बुलाया गया था, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आयोजन किस संस्था के माध्यम से और किन अधिकृत चिकित्सकीय व्यवस्थाओं के साथ किया जाना था।

अब विभागीय जांच की जरूरत

मामले में सबसे उचित रास्ता यही होगा कि सक्षम अधिकारी पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराएं और यह स्पष्ट करें कि सरकारी पशु चिकित्सालय परिसर में कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति किसने दी? क्या RCM के पास लिखित अनुमति थी? टेंट, माइक और अन्य व्यवस्थाएं किसकी अनुमति से लगाई गईं? क्या रक्तदान शिविर के लिए कोई अधिकृत चिकित्सकीय टीम या अनुमति थी? कार्यक्रम में सरकारी अधिकारी की मौजूदगी किस हैसियत से हुई? RCM प्रतिनिधि द्वारा ‘डॉ. साहब के आदेश’ का दावा किस आधार पर किया गया? यदि अनुमति नहीं थी तो सरकारी परिसर का उपयोग करने वालों पर क्या कार्रवाई होगी? और विभागीय स्तर पर जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

सरकारी परिसर निजी आयोजनों का मंच तो नहीं?

यह मामला केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकारी भवन और परिसर जनता के संसाधन हैं। यदि किसी निजी संस्था को वहां कार्यक्रम की अनुमति दी गई है तो उसकी प्रक्रिया और आधार पारदर्शी होना चाहिए। और यदि अनुमति नहीं दी गई थी, तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। अब सबकी निगाह पशुपालन विभाग के उच्चाधिकारियों और जिला प्रशासन पर है कि वायरल वीडियो और सामने आए विरोधाभासी बयानों को संज्ञान में लेकर पूरे प्रकरण की जांच कराई जाती है या नहीं। क्योंकि असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पशु चिकित्सालय परिसर में कार्यक्रम हुआ। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी परिसर में कार्यक्रम हुआ तो अनुमति किसकी थी? और अगर अनुमति नहीं थी, तो सरकारी तंत्र की निगरानी के बावजूद यह सब कैसे हुआ?

रिपोर्ट- विनोद कुमार गुप्ता

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