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लोकसभा चुनाव: इस बार किस नेता को सलाम करेगी सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र की जनता, जानिए इस सीट का पूरा इतिहास



बलिया (ब्यूरो) सलेमपुर लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश के मुख्य अस्सी संसदीय सीटों में से एक है और इसकी संसदीय सीट संख्या 71 है, यह संसदीय सीट प्रदेश के दो जिलों बलिया और देवरिया से मिलाकर बना है, सलेमपुर प्रदेश के सबसे पुराने तहसील हेडक्वार्टर के रूप में जाना जाता है,  ब्रिटिशकाल में तहसील के रूप में इसकी स्थापना 1939 में हुई थी, सलेमपुर के पास से छोटकी गंडक नदी गुजरती है और यहां पर पूर्वोत्तर रेलवे (एनईआर) का एक प्रमुख रेलवे स्टेशन भी है।
आजादी से पहले तक सलेमपुर सबसे बड़ी तहसील हुआ करती थी, लेकिन समय-समय पर बरहज, रुद्रपुर और भाटपार रानी को अलग-अलग करते हुए नए नए तहसील बना दिए गए, सलेमपुर का अपना इतिहास भी काफी पुराना है, यह क्षेत्र मुस्लिम आक्रमणकारियों के आने से पहले गुप्त वंश और पाल शासकों के अधीन रहा है, घने जंगलों के कारण मुस्लिम आक्रमणकारी इस क्षेत्र में आक्रमण के लिए नहीं आ सके थे।

एक नजर सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर-
सलेमपुर संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत पांच विधानसभा क्षेत्र भाटपार रानी, सलेमपुर (अनुसूचित जाति), बेल्थरा रोड (अनुसूचित जाति), सिकंदरपुर और बांसडीह आते हैं, जिसमें 2 विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है।
देवरिया जिले में पड़ने वाले भाटपार रानी विधानसभा क्षेत्र पर समाजवादी पार्टी का कब्जा है, उसके उम्मीदवार आशुतोष उपाध्याय ने 2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के जयंत कुशवाहा को 11,097 मतों के अंतर से हराया था, वहीं सलेमपुर विधानसभा क्षेत्र एक रिजर्व सीट है और यहां से भारतीय जनता पार्टी के काली प्रसाद ने समाजवादी पार्टी के विजय लक्ष्मी गौतम को आसान मुकाबले में 26,654 मतों के अंतर से हराया था, वहीं बेल्थरा रोड से भारतीय जनता पार्टी के धनंजय कन्नौजिया ने समाजवादी पार्टी के गोरख पासवान पर 18,319 मतों के अंतर से जीत हासिल की थी, यह सीट भी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है, 2012 के चुनाव में गोरख पासवान यहां से विजयी रहे थे।
2017 के चुनाव में बांसडीह विधानसभा क्षेत्र पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार रामगोविंद चौधरी ने जीत हासिल की थी, उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी केतकी सिंह को नजदीकी मुकाबले में 1,687 मतों के अंतर से हराया था।

एक नजर सलेमपुर लोकसभा के सामाजिक ताने-बाने पर-
आर्थिक रूप से सलेमपुर संसदीय सीट राज्य के पिछड़े क्षेत्रों में आता है, 2011 की जनगणना के मुताबिक सलेमपुर तहसील की आबादी करीब 6 लाख (6,04,483) है जिसमें 3 लाख पुरुष (49%)  और 3.1 लाख (51%) महिलाएं हैं. यहां की 80 फीसदी आबादी सामान्य वर्ग के लोगों की है, जबकि 16% लोग अनुसूचित जाति के लोगों की है, जबकि 4 फीसदी आबादी अनुसूचित जनजाति के लोगों की हैं।
धर्म के आधार पर देखा जाए तो हिंदुओं की आबादी 86.2 फीसदी है तो 13.5 फीसदी मुस्लिमों की आबादी रहती है, यहां लिंगानुपात प्लस में है, 1 हजार पुरुषों में 1,027 महिलाएं हैं. साक्षरता दर 73 फीसदी है जिसमें  82 फीसदी पुरुष और 62 फीसदी महिलाएं भी शामिल हैं।

कुछ ऐसा रहा था 2014 का जनादेश-
2014 के आम चुनाव के लिहाज से सलेमपुर संसदीय सीट पर इलेक्टोरल की बात की जाए तो यहां पर 16,61,737 लोग शामिल रहे, पिछले लोकसभा चुनाव में यहां पर 51.50 फीसदी मतदान हुआ था, बीजेपी, सपा, बसपा और कांग्रेस समेत 13 उम्मीदवारों ने अपनी दावेदारी ठोकी थी, जिसमें मुख्य मुकाबला बीजेपी, बसपा और सपा के बीच रहा था।
बीजेपी के रविंद्र कुशवाहा ने 45.89 फीसदी वोट हासिल करते हुए 3,92,213 मत हासिल किया, उन्होंने बसपा के रवि शंकर पप्पू को 2,32,342 मतों (27.18%) के अंतर से हराया था, रवि शंकर को महज 1,59,871 मत मिले, सपा और कांग्रेस इस कड़े संघर्ष में क्रमशः तीसरे और पांचवें पायदान पर रही थी।
2014 से पहले के लोकसभा चुनाव पर नजर डाली जाए तो 1957 से अब तक हुए 15 लोकसभा चुनाव में शुरुआती 7 चुनाव में 1957 से 1984 तक 6 बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है, लेकिन 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद यहां पर जीत हासिल करने के बाद उसे अपनी पहली जीत का इंतजार है तो बीजेपी ने 2014 के आम चुनाव में पहली बार यहां से जीत हासिल की थी, 1989 और 1991 में जनता दल के हरिकेवल प्रसाद विजयी रहे थे, तो सपा और बसपा ने भी दो दो बार यहां पर जीत हासिल की है, हरिकेवल कुशवाहा यहां से चार बार सांसद रहे हैं।
सलेमपुर के 56 वर्षीय सांसद रविंद्र कुशवाहा की अगर शैक्षणिक योग्यता की बात की जाए तो उन्होंने 12वीं कक्षा तक की शिक्षा हासिल की है, पेशे से वह एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उनके परिवार में एक बेटा और एक बेटी है, वह देवरिया जिले के इथुआ चंदौली में रहते हैं।

एक नजर सांसद के रिपोर्ट कार्ड पर-
सांसद रविंद्र कुशवाहा पहली बार लोकसभा पहुंचे हैं, वह फूड, कन्ज्यूमर एंड पब्लिक डिस्ट्रब्यूशन कमिटी की स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य भी हैं, जहां तक लोकसभा में सत्र के दौरान उनकी उपस्थिति का सवाल है तो उनकी उपस्थिति गुजरे साढ़े चार साल के बुलाए गए सत्रों (8 जनवरी, 2019) में उनकी उपस्थिति का रिकॉर्ड 89 फीसदी है, वहीं इस दौरान 6 बार उनकी उपस्थिति 100 फीसदी रही, जबकि 6 अन्य सत्रों में उनकी उपस्थिति 90 फीसदी से ऊपर रही, उपस्थिति के मामले में उनका सबसे खराब प्रदर्शन 2018 के बजट सत्र में रहा जहां उनकी उपस्थिति कुल 66 फीसदी रही।
हालांकि लोकसभा में उनकी सक्रियता खास नहीं रही है, उन्होंने कुल 19 बहस में हिस्सा लिया, जबकि बहस में शामिल होने के मामले में उनके राज्य का औसत 107.2 फीसदी है और राष्ट्रीय औसत 65.3 है, सवाल पूछने के मामले में भी वह राष्ट्रीय (285) और राज्य (193) औसत से काफी पीछे है, उन्होंने अभी तक सिर्फ़ 86 सवाल पूछे हैं।
एक तरह से देखा जाए तो सलेमपुर लोकसभा सीट पर पिछले 30 सालों में समाजवादी पार्टी का दबदबा रहा है, बीजेपी तो पिछली बार मोदी लहर में यह सीट निकालने में कामयाब रही है, इस बार राज्य में सपा-बसपा एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं, ऐसे में बदले समीकरण में बीजेपी के लिए यह सीट निकाल पाना आसान नहीं दिख रहा हैं, हालांकि पिछले चुनाव के आधार पर बीजेपी के विजयी उम्मीदवार को करीब 46 फीसदी वोट मिले थे जबकि बसपा को 18.7 और सपा को 19.68 फीसदी वोट हासिल हुए, दोनों के योग (38.38 फीसदी) भी बीजेपी उम्मीदवार को मिले वोट से काफी कम है, अगर पिछली सूरत बनी रही तो बीजेपी की राह आसान तो हो सकती है, मगर यहां पर सभी पार्टियों ने अपने पत्ते खोल दिए हैं, भारतीय जनता पार्टी ने अपने वर्तमान सांसद रविंद्र कुशवाहा पर फिर से दांव लगाया है, सपा बसपा गठबंधन की तरफ से आर एस कुशवाहा मैदान में है, वही कांग्रेस ने  वाराणसी के पूर्व सांसद राजेश मिश्रा को मैदान में उतारा है  ऐसे में अब यह देखना बहुत ही दिलचस्प होगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में किस पार्टी का दबदबा सलेमपुर में कायम होता है, और यहां की जनता किस दल के प्रत्याशी को सलाम करतीं हैं।

रिपोर्ट- विनोद कुमार गुप्ता

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