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उत्तर प्रदेश: कौन जीतेगा कानपुर का सियासी रण, एक नजर कानपुर के सियासी सफर पर


संसदीय सीट कानपुर का सियासी पारा आसमान छूने लगा है, मैदान भी लगभग सज कर तैयार है, गंगा के किनारे बसा औद्योगिक शहर कानपुर देश की हाई प्रोफाइल लोकसभा सीटों मे से एक है. एक दौर में कपड़ा उद्योग के चलते इसे 'पूर्व का मैनचेस्टर' कहा जाता था. इसे लेदर सिटी के नाम से भी जाना जाता है. हालांकि वक्त और सरकार की उपेक्षा के चलते यह शहर अपनी पहचान खोता चला गया और देश के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल हो गया. कानपुर उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 43वीं नंबर की सीट हैं। इस संसदीय सीट के अन्तर्गत उत्तर प्रदेश विधानसभा की 5 सीटें आती है-
1 = गोविंद नगर
2 = सीसामऊ
3 = आर्य नगर
4 = किदवई नगर
5 = कानपुर कैंट

एक नजर कानपुर के सियासी सफर पर-

आजादी के बाद से अब तक कानपुर संसदीय सीट पर 17 बार चुनाव हो चुके हैं. कांग्रेस इस सीट पर महज 6 बार जीत का परचम लह रहा चुकी है, वहीं भाजपा इस सीट पर 4 बार कब्जा जमा चुकी हैं।पहली बार 1952 में हुए चुनाव में कांग्रेस के हरिहरनाथ शास्त्री ने जीत दर्ज की थी. 1957 में दूसरी बार हुए चुनाव में यह सीट कांग्रेस के हाथों से निकल गई, और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के राजा राम शास्त्र में जीत दर्ज किया।1957 से 1977 तक एसएम बनर्जी ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में कानपुर सीट का प्रतिनिधित्व किया. इसके बाद 1977 में भारतीय लोकदल से मनोहर लाल ने जीत हासिल की. 1980 में आरिफ मो. अहमद ने जीत हासिल करते हुए कांग्रेस की वापसी कराई, लेकिन 9 साल बाद 1989 में कांग्रेस के हाथ से यह सीट फिर से निकल गई और सीपीएम से सुभाषनी अली ने जीत दर्ज कराई.राम मंदिर आंदोलन के दौरान बीजेपी ने कानपुर सीट पर अपना कब्जा जमाया. 1991 में जगतवीर सिंह ने पहली बार यहां से बीजेपी का परचम लहराया, इसके बाद बीजेपी 1996 और 1998 में भी यहां से जीतने में कामयाब रही, कांग्रेस ने 1999 लोकसभा चुनाव में श्रीप्रकाश जायसवाल को उतारकर बीजेपी के मजबूत हो रहे दुर्ग को भेदने में सफल रही, इसके बाद वो 2004 और 2009 में भी यहां से जीतने कामयाब रहे. लेकिन 2014 के चुनाव में मोदी लहर में बीजेपी ने इस सीट पर वरिष्ठ भाजपा नेता डॉ मुरली मनोहर जोशी को अपना उम्मीदवार बनाया और उन्होंनेे इस सीट पर जीत का परचम लहराया.

आसन नहीं भाजपा की राह

लोकसभा चुनाव नजदीक आने के साथ-साथ कानपुर में सियासी माहौल गरमा रहा है। कभी कम्युनिस्ट, कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी के गढ़ के रूप में मशहूर रही इस सीट को लेकर गठबंधन में खींचतान साफतौर पर नजर आ रही है। सपा बसपा गठबंधन ने जहां इस सीट से राम कुमार को अपना उम्मीदवार घोषित किया है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने इस सीट पर तीन बार सांसद रह चुके और उत्तर प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेता श्री प्रकाश शुक्ला को एक बार फिर से मैदान में उतारा है, भाजपा के टिकट पर सत्यदेव पचौरी कानपुर लोकसभा सीट से अपनी किस्मत आजमाएंगे।क्षेत्र के मौजूदा सांसद डॉ मुरली मनोहर जोशी ने साल 2014 में कानपुर में जीत दर्ज की थी। वहीं कांग्रेस दूसरे नंबर पर थी। साल 2017 के विधानसभा चुनावों में भी कानपुर से बीजेपी जीती थी। हालांकि, अब माहौल बदला है। बीजेपी राष्ट्रवाद की भावना को आगे कर रही है। नरेंद्र मोदी यहां रैली भी कर चुके हैं। इस संसदीय सीट पर ब्राह्मणो की संख्या ज्यादा होने से भी कांग्रेसी एक बार फिर से श्री प्रकाश शुक्ला को लेकर आश्वस्त दिख रही है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि कानपुर की जनता किसे पसंद करती है हाथ का साथ या कमल का फूल।

रिपोर्ट- विनोद कुमार गुप्ता, सत्यम राय

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