सिकन्दरपुर (बलिया) प्रदेश सरकार की शक्ति का निजी स्कूलों पर कोई असर नहीं होता दिखाई दे रहा है आए दिन री-एडमिशन के नाम पर खुलेआम पैसे लिए जा रहे हैं, वहीं स्कूल से विद्यार्थियों को किताब व कॉपी खरीदने को भी मजबूर किया जा रहा है, आश्चर्य की बात तो यह है कि सभी स्कूल अपने अपने विद्यालयों को मान्यता प्राप्त विद्यालय बताते हुए अपने विद्यालय को दूसरे विद्यालय से अच्छा विद्यालय कह कर एक ही कक्षा में प्रवेश के लिए अलग-अलग तरह के शुल्क वसूल रहे हैं।
विदित हो कि मान्यता प्राप्त विद्यालय में अप्रशिक्षित अध्यापक से पढ़ाने का कार्य नहीं कराया जा सकता पर इस नियम के बावजूद भी अधिकांश मान्यता प्राप्त विद्यालयों में अप्रशिक्षित अध्यापकों का ही बोलबाला है, प्रबंधक इन अध्यापकों का या तो शोषण करते हैं या इनके सहारे विद्यालय के छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों का आर्थिक व मानसिक शोषण भी करते हैं, अप्रशिक्षित अध्यापकों के सहारे कितनी बढ़िया वह अच्छी शिक्षा मिल रही होगी इसका अंदाज बच्चों की कॉपीयां देखने के बाद ही मिलती है, अभिभावक सब कुछ की जानकारी रखने के बाद ही बेहतर शिक्षा के नाम पर अपने बच्चों का प्रवेश निजी स्कूलों में ही करने को बाध्य हैं, इसका एक ही कारण है वह यह है कि उसके आवास से यह विद्यालय काफी दूर होता है जहां वास्तव में अच्छी पढ़ाई होती है।
हस्तक्षेप (मानवाधिकार निगरानी समिति) ने ऐसे विद्यालय को चिन्हित करने का काम शुरू कर दिया है, जो स्कूल का संचालन प्राइवेट लिमिटेड की तर्ज पर कर रहे हैं तथा बेहतर शिक्षा मुहैया कराने के नाम पर खुलेआम फीस के नाम पर अभिभावकों की जेब पर डाका डाल रहे हैं, हस्तक्षेप के राष्ट्रीय महासचिव डीपी यादव ने बताया कि जनपद के रसड़ा, बेल्थरा रोड और सिकंदरपुर तहसील में ऐसे विद्यालयों की बाहुलता है जो शिक्षा के नाम पर अपनी निजी दुकान को चमका और चला रहे हैं।
रिपोर्ट- विनोद कुमार गुप्ता

