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उत्तर प्रदेश: कौन बनेगा घोसी का बाजीगर, एक नजर घोसी के सियासी सफर पर


घोसी (मऊ) देश में आज पहले चरण का मतदान समाप्त हो गया। इसके साथ ही सभी राजनीतिक दल अगले चरण के मतदान के लिए तैयारियों में जुट गए। लोकसभा सीटों के लिहाज से देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश सभी राजनीतिक दलों के लिए विशेष महत्त्व रखता है। पूर्वांचल से लेकर सुबे की राजनीति में विशेष महत्व रखने वाले लोकसभा सीट घोसी के बारे में आज बात होगी।
तमसा नदी के तट पर बसा यह इलाका खुद में रामायण और महाभारत काल की सांस्कृतिक और पुरातात्विक अवशेषों को समेटे हुए हैं, 1957 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने इसे भारत का मैनचेस्टर बताया था, 2011 के जनगणना के अनुसार 77 फीसदी आबादी सामान्य वर्ग के लोगों की है. इसके अलावा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी क्रमशः 21 फीसदी और 1 फीसदी है. घोसी में ज्यादातर आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है.धर्म के आधार पर देखा जाए तो इस क्षेत्र में 87.29 फीसदी लोग हिंदू हैं तो 12.41 फीसदी लोग मुस्लिम समुदाय से हैं. 2011 के लिंगानुपात के आधार पर एक हजार पुरुषों की आबादी पर महिलाओं की संख्या 1,008 है।

एक नजर घोसी की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर-

1957 में इस सीट पर पहली बार हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार उमराव सिंह ने जीत दर्ज किया। लेकिन उसके बाद 1962 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के उम्मीदवार जय बहादुर सिंह ने कांग्रेस को शिकस्त दिया। कहा जाए तो पूर्वांचल में वामपंथ का गढ़ घोसी सीट ही रहा है, जहां से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) का कई सालों तक कब्जा रहा, 1957 से अब तक 16 बार हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 4 बार जीत मिली, जबकि सीपीआई ने 5 बार जीत हासिल की है, गोरखपुर यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति करने वाले कल्पनाथ राय के नाम से इस सीट को पहचान मिली, कांग्रेस के टिकट पर कल्पनाथ राय ने पहली बार 1989 में जीत हासिल की थी, इसके बाद वह 1991, 1996 और 1998 में जीत कर लोकसभा पहुंचे. कांग्रेस से मनमुटाव होने के बाद 1996 के चुनाव में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की, इसके बाद 1998 में समता पार्टी के टिकट पर चौथी बार लोकसभा पहुंचे, इसके अलावा 1974–80, 1980–86 और 1986 में राज्यसभा में कांग्रेस सांसद रहे. कांग्रेस राज में वह बार मंत्री भी रहे, नरसिम्हा राव सरकार के कार्यकाल में वह खाद्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रहे और इस दौरान इन पर घोटाले के आरोप लगे, वह इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भी मंत्री रहे, 1999 में कल्पनाथ राय के निधन के बाद बसपा (1999), सपा (2004), 2009 (बसपा) और 2014 (बीजेपी) ने इस सीट से जीत हासिल की. 2014 में बीजेपी यहां से पहली बार जीत हासिल करने में कामयाब रही।

2019 मे कौन मारेगा बाजी-

2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने पहली बार अपना खाता खोला। बीजेपी उम्मीदवार हरिनारायण राजभर ने बसपा के दारा सिंह चौहान को हराकर अपनी पार्टी के लिए यहां से खाता खोला।हरिनारायण को 36.53 फीसदी यानी 3,79797 वोट मिले, जबकि बसपा के दारा सिंह को 22,49 फीसदी (2,33,782) वोट मिले. हरिनारायण ने यह चुनाव 1,46,015 मतों के अंतर से जीता था. बाहुबली मुख्तार अंसारी तीसरे नंबर पर रहे. उन्हें 16 फीसदी यानी 1,66,443 मत मिले थे. इस बार सुबे की दो बड़ी पार्टीयां सपा और बसपा एक साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतर रही हैं, सियासी पंडितों की मानें तो गठबंधन और भाजपा के बीच इस संसदीय सीट पर भीषण घमासान होगा ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा की लोकसभा सीट घोसी से कौन मारता है बाजी।

रिपोर्ट- विनोद कुमार गुप्ता, सत्यम राय

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