लखनऊ (ब्यूरो) देश की सियासी पार्टियों को यह भली-भांति पता है कि लोकसभा का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। सभी दल सुबे की सियासत में मजबूती के साथ हुंकार भरना शुरू कर चुके हैं। सुबे की बहुचर्चित सीटों में से एक आजमगढ़ पर प्रदेशवासियों की विशेष नजर है। सपा ने एक लिस्ट जारी करते हुए प्रदेश की सियासी गलियारों में अटकलों पर पूर्ण विराम लगा दिया। सपा ने आजमगढ़ से समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को अपना उम्मीदवार घोषित किया। आपको बता दें कि वर्तमान में सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव आजमगढ़ से सांसद हैं। वहीं दूसरी ओर भाजपा के द्वारा अब तक इस सीट पर कोई अधिकारिक घोषणा नहीं हुआ है। सूत्रों की मानें तो हाल में ही भाजपा जॉइन किए भोजपुरी अभिनेता और गायक दिनेश लाल निरहुआ को भाजपा यहां से उम्मीदवार बना सकती है।
एक नजर आजमगढ़ लोकसभा क्षेत्र पर-
उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में तमसा नदी के तट पर स्थित आजमगढ़ उत्तर प्रदेश का एक लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र है। आपको बता दें कि शाहजहां के शासनकाल में एक शक्तिशाली जमींदार आजम खां ने 1965 में स्थापना की थी। और यही कारण है कि यह शहर आजमगढ़ नाम से जाना जाता हैं। लोकसभा क्षेत्र में मतो की संख्या - 1,578,854 जिसमें पुरुषों की मत संख्या - 853,748 और महिला मतों की संख्या - 725,106 है। इस लोकसभा क्षेत्र के अंदर उत्तर प्रदेश की 5 विधानसभाएं में आती है।
1= गोपालपुर
2 = सगड़ी
3 = मुबारकपुर
4 = आजमगढ़
5 = मेहनगर (सुरक्षित)
आजमगढ़ लोकसभा क्षेत्र का सियासी सफर-
1952 से 1971 तक हुए आमचुनावों में कांग्रेस ने यहां लगातार पांच बार जीत दर्ज की है, क्रमशः 1952 में अलगू राय शास्त्री, कालिका सिंह, राम हरख यादव, चंद्रजीत यादव ने लगातार दो बार इस निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव जीता। 1977 के चुनावों में कांग्रेस का विजय रथ जनता पार्टी के राम नरेश यादव ने रोका था लेकिन अगले ही साल यहां उपचुनाव हुए और कांग्रेस की मोहसिना किदवई ने निर्वाचित होकर यहां इतिहास रचा , वो आजमगढ़ की पहली महिला सांसद बनी। 1980 में चंद्रजीत यादव ने जनता पार्टी(सेक्युलर) से जीत दर्ज की। 1984 में संतोष सिंह ने जीत हासिल करके कांग्रेस का इन्तज़ार ख़त्म किया। 1989 में यहां से राम कृष्ण यादव बहुजन समाज पार्टी और 1991 में चंद्रजीत यादव जनता पार्टी की टिकट पर जीतकर लोकसभा पहुंचे। 1996 से 2004 तक कभी सपा ने बसपा को हराकर तो कभी बसपा ने सपा को हराकर आजमगढ़ की सीट पर कब्ज़ा किया। 2008 में यहां उपचुनाव हुए जिसमें बसपा के अकबर अहमद निर्वाचित हुए। 2009 में समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद रमाकांत यादव भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर लड़े और आज़मगढ़ में भाजपा को पहली बार जीत दिलाई। साल 2014 में हुए आम चुनाव में सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने आज़मगढ़ से चुनाव लड़ा और जीत का नया इतिहास भी लिखा।
आसान नहीं अखिलेश की राह-
अखिलेश ने एक बार फिर से पिता की विरासत को बचाने के लिए आजमगढ़ सीट का चयन किया है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आजमगढ़ सीट के जरिए पूरे पूर्वांचल को साधने की कोशिश में लगे हुए हैं। लेकिन क्या अखिलेश के लिए आजमगढ़ की राह आसान रहने वाली है? यह सवाल और भी बड़ा और गंभीर तब बन जाता है जब पिछले चुनाव में सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव महज 70000 मतों से भाजपा प्रत्याशी को शिकस्त दिए। और फिर इस बार तो चाचा शिवपाल का आशीर्वाद भी अखिलेश के सर पर नहीं है। हालांकि शिवपाल यादव की पार्टी आजमगढ़ से प्रत्याशी उतारेगी कि नहीं इस पर अभी तक कोई अधिकारिक एलान नहीं हुआ हैं। लेकिन बसपा का साथ अखिलेश को जरूर मजबूत स्थिति में लाकर खड़ा कर सकता है। राजनीतिक पंडितों की मानें तो बसपा की सारे मतों का अखिलेश को मिलना मुश्किल दिख रहा है। और इस बीच इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए भाजपा इस सीट के लिए किस नाम का ऐलान करती है। हाल ही में भाजपा ज्वाइन किए दिनेश लाल यादव निरहुआ को भाजपा से आजमगढ़ लोकसभा का टिकट मिलने की अटकलें तेज हो गई। इन सब के बीच यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या अखिलेश अपने पिता की विरासत को बचा पाते हैं या भाजपा एक बार फिर से 2009 के प्रदर्शन को दोहराती हैं।
विशेष रिपोर्ट- विनोद कुमार गुप्ता, सत्यम राय

