आज डिजिटल क्रांति, सोशल मीडिया और बदलते आर्थिक व सामाजिक समीकरणों के बीच एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी हैं सत्ता, समाज और जनता के बीच सेतु बनने वाली पत्रकारिता, वायरल और विश्वसनीय पत्रकारिता के बीच किस ओर जा रहा आधुनिक भारत का मीडिया?
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तकनीक ने लगभग हर क्षेत्र को किया प्रभावित
नई दिल्ली (ब्यूरो)। आज का भारत तेजी से बदल रहा है। तकनीक ने जीवन के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित किया है और पत्रकारिता भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही। कभी अखबार की सुबह से शुरू होने वाली खबर अब मोबाइल की स्क्रीन पर चौबीसों घंटे उपलब्ध है। एक घटना घटती है और कुछ ही क्षणों में उसका वीडियो, तस्वीर, टिप्पणी और प्रतिक्रिया हजारों लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। लेकिन इस तेज रफ्तार के बीच एक गंभीर सवाल हमारे सामने खड़ा हैं। क्या पत्रकारिता भी उतनी ही तेजी से बदल रही है, जितनी तेजी से सूचना का संसार बदल रहा है? और यदि बदल रही है तो वह किस दिशा में जा रही है?
आखिर क्या हैं पत्रकारिता का मूल धर्म?
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य केवल सूचना पहुंचाना नहीं है। उसका वास्तविक दायित्व है। सत्य की खोज करना, सत्ता से सवाल पूछना, समाज की आवाज को सामने लाना और नागरिकों को तथ्यपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराना। लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि पत्रकार सत्ता का विरोध करने के लिए ही मौजूद है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि पत्रकार सत्ता का समर्थक बने। पत्रकारिता का वास्तविक धर्म सत्ता और विपक्ष दोनों से समान दूरी रखते हुए जनहित के सवालों को प्राथमिकता देना है, जहां सरकार अच्छा काम कर रही हो, वहां तथ्य सामने रखना भी पत्रकारिता है और जहां व्यवस्था में कमी हो, वहां सवाल उठाना हीं सच्ची पत्रकारिता है।
कैसा हो सत्ता और चौथे स्तंभ का सामंजस्य?
लोकतंत्र में सत्ता और पत्रकारिता का संबंध टकराव का नहीं, बल्कि जवाबदेही और संवाद का होना चाहिए। सत्ता को पत्रकार के सवालों से असहज होने के बजाय यह समझना होगा कि सवाल लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत हैं। दूसरी ओर पत्रकारिता को भी यह समझना होगा कि आलोचना और आरोप में अंतर होता है। पत्रकार का काम किसी व्यक्ति को दोषी साबित करना नहीं, बल्कि तथ्यों को सामने लाना है। किसी आरोप को खबर बनाना अलग बात है और आरोप को सत्य घोषित कर देना अलग बात। यही अंतर पत्रकारिता की विश्वसनीयता तय करता है।
डिजिटल युग में पत्रकारिता को अवसर भी चुनौती भी
आज पत्रकारिता केवल बड़े मीडिया संस्थानों तक सीमित नहीं है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने एक सामान्य व्यक्ति को भी सूचना का स्रोत बना दिया है। ग्रामीण क्षेत्र का कोई नागरिक सड़क की समस्या, बिजली की परेशानी, स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति या प्रशासनिक लापरवाही का वीडियो बनाकर कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंचा सकता है। यह बदलाव लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन इसके साथ एक खतरा भी पैदा हुआ हैं। सूचना और सत्य के बीच की दूरी कम नहीं, बल्कि कई बार और अधिक जटिल हो गई है। सोशल मीडिया पर वायरल होना किसी सूचना के सत्य होने का प्रमाण नहीं है। आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यही है कि वायरल सूचना को खबर बनाने से पहले उसकी तथ्यों की सत्यता जांची जाए।
ग्रामीण क्षेत्रों में बदल रहा पत्रकारिता का समीकरण
पत्रकारिता में सबसे बड़ा बदलाव ग्रामीण भारत में दिखाई दे रहा है। कभी ग्रामीण पत्रकारिता को मुख्यधारा की पत्रकारिता की तुलना में सीमित संसाधनों वाली व्यवस्था माना जाता था। आज तस्वीर बदल रही है। छोटे कस्बों और गांवों से निकलने वाले डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म स्थानीय समस्याओं को सीधे जनता और प्रशासन तक पहुंचा रहे हैं। गांव की टूटी सड़क, खराब ट्रांसफॉर्मर, बंद नलकूप, अस्पताल में डॉक्टर की अनुपस्थिति, विद्यालय की समस्या, राशन वितरण, पंचायत की गतिविधियां या किसी गरीब परिवार की परेशानी। ये ऐसी खबरें हैं जिन्हें राष्ट्रीय मीडिया में शायद जगह न मिले, लेकिन स्थानीय पत्रकार के लिए यही खबरें समाज की वास्तविक धड़कन हैं।
ग्रामीण पत्रकारिता का असली महत्व
ग्रामीण पत्रकारिता का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वह स्थानीय खबर देती है। उसका महत्व इसलिए है क्योंकि वह उस नागरिक की आवाज बनती है जिसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक आसानी से नहीं पहुंच पाती, जब किसी गांव की सड़क वर्षों से खराब हो और स्थानीय पत्रकार उस समस्या को लगातार सामने लाता है, तो पत्रकारिता केवल खबर नहीं कर रही होती। वह व्यवस्था से जवाब मांग रही होती है, जब किसी गरीब परिवार को सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलता और पत्रकार उसके सवाल को सामने रखता है, तो वह लोकतंत्र के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने का माध्यम बनता है। यही ग्रामीण पत्रकारिता की असली शक्ति है।
ग्रामीण पत्रकारिता के सामने भी कम नहीं चुनौतियां
स्थानीय पत्रकारों के सामने संसाधनों की कमी, आर्थिक दबाव, राजनीतिक दबाव, विज्ञापन पर निर्भरता और कभी-कभी सामाजिक दबाव जैसी अनेक चुनौतियां होती हैं। कई बार पत्रकार को उसी क्षेत्र में रहकर रिपोर्टिंग करनी होती है, जहां वह खबर लिख रहा होता है। खबर प्रकाशित होने के बाद भी उसे उसी समाज, उसी बाजार और उन्हीं संस्थाओं के बीच रहना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में निष्पक्षता बनाए रखना आसान नहीं, लेकिन यही स्थानीय पत्रकारिता की सबसे बड़ी परीक्षा है।
पत्रकारिता बनाम ‘वायरल कंटेंट’ का दौर
आज पत्रकारिता के सामने एक और बड़ा सवाल है। क्या हर वायरल सामग्री पत्रकारिता है? निश्चित रूप से नहीं। वीडियो का वायरल होना, पोस्ट पर लाखों व्यू आना या किसी शीर्षक पर हजारों प्रतिक्रियाएं मिलना पत्रकारिता की गुणवत्ता का प्रमाण नहीं है। पत्रकारिता की कसौटी व्यूज नहीं, विश्वसनीयता होनी चाहिए। एक पत्रकार के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसकी खबर सबसे पहले वायरल हुई, बल्कि यह है कि वर्षों बाद भी पाठक उसकी खबर को विश्वसनीय मानता है।
ब्रेकिंग से ज्यादा महत्वपूर्ण है सही
आज न्यूज रूम में सबसे बड़ा दबाव खबर सबसे पहले देने का है। लेकिन पत्रकारिता का सिद्धांत यह होना चाहिए। सबसे पहले नहीं, सबसे सही। यदि किसी खबर की पुष्टि में दस मिनट अतिरिक्त लगते हैं, लेकिन उससे गलत सूचना फैलने से बचती है, तो वह दस मिनट पत्रकारिता की कीमत नहीं, उसकी मजबूती हैं। विशेषकर अपराध, यौन उत्पीड़न, राजनीतिक आरोप, सांप्रदायिक संवेदनशीलता और किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा से जुड़े मामलों में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
सवाल पूछना पत्रकारिता है, फैसला सुनाना नहीं
एक मजबूत पत्रकार वह नहीं जो हर मामले में फैसला सुना दे। मजबूत पत्रकार वह है जो सही सवाल पूछे। क्या हुआ? कब हुआ? कहां हुआ? किसने कहा? इसका प्रमाण क्या है? दूसरे पक्ष का क्या कहना है? प्रशासन का क्या पक्ष है? और उपलब्ध दस्तावेज क्या बताते हैं? इन सवालों के जवाब खोजने की प्रक्रिया ही पत्रकारिता को सोशल मीडिया की सामान्य चर्चा से अलग करती है।
पत्रकारिता को पक्ष नहीं, तथ्य चुनना होगा
आज समाज राजनीतिक और वैचारिक रूप से कई स्तरों पर विभाजित दिखाई देता है। ऐसे समय में पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। अपने पाठक को खुश करने के बजाय उसे सच्ची और संतुलित जानकारी देना। पत्रकार का काम किसी विचारधारा के लिए तालियां बजाना या किसी विचारधारा को निशाना बनाना नहीं है। पत्रकार का पक्ष होना चाहिए, जनता, संविधान, तथ्य और सत्य।
क्या हो आधुनिक पत्रकारिता की दिशा?
मेरा मानना है कि आधुनिक भारत की पत्रकारिता को तीन चीजों के बीच संतुलन बनाना होगा। तकनीक की गति, पत्रकारिता की विश्वसनीयता और समाज की जिम्मेदारी। डिजिटल माध्यमों को अपनाना जरूरी है। सोशल मीडिया की शक्ति का इस्तेमाल करना भी जरूरी है। वीडियो पत्रकारिता, मोबाइल पत्रकारिता और डिजिटल रिपोर्टिंग आने वाले समय की वास्तविकता हैं। लेकिन तकनीक जितनी तेजी से आगे बढ़े, पत्रकारिता का मूल चरित्र उतना ही मजबूत रहना चाहिए।
खबरें आजतक Live जैसे मंचों की जिम्मेदारी
स्थानीय डिजिटल मीडिया के सामने अवसर बहुत बड़ा है। एक स्थानीय न्यूज प्लेटफॉर्म आज सीधे अपने क्षेत्र के लोगों तक पहुंच सकता है। लेकिन इस अवसर के साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। खबरें आजतक Live जैसे मंचों के लिए स्थानीय समाज की वास्तविक समस्याओं को सामने लाना, प्रशासन से सवाल करना, उपलब्धियों को जगह देना और नागरिकों की आवाज को उचित मंच देना पत्रकारिता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। हमें यह तय करना होगा कि हमारा लक्ष्य केवल खबर को वायरल करना नहीं, बल्कि खबर को विश्वसनीय बनाना है।
गांवों से भी तय होगा पत्रकारिता का भविष्य
भारत का वास्तविक सामाजिक और आर्थिक जीवन केवल महानगरों में नहीं बसता। देश की बड़ी आबादी आज भी गांवों और छोटे कस्बों में रहती है। इसलिए आने वाले समय में ग्रामीण पत्रकारिता और स्थानीय डिजिटल मीडिया की भूमिका और महत्वपूर्ण होगी, जो पत्रकार गांव की धूल, खेत की मिट्टी, बाजार की आवाज, स्कूल की घंटी, अस्पताल की स्थिति और आम नागरिक की परेशानी को समझ सकेगा, वही वास्तव में भारत की जमीनी तस्वीर को सामने रख पाएगा।
किस ओर जा रही है आधुनिक भारत की पत्रकारिता?
यह सवाल जितना पत्रकारों से जुड़ा है, उतना ही समाज से भी। यदि समाज केवल सनसनी चाहता है, तो पत्रकारिता सनसनी की ओर जाएगी। यदि समाज तथ्य चाहता है, तो पत्रकारिता तथ्य की ओर जाएगी। यदि पाठक सवाल पूछने वाली पत्रकारिता को महत्व देगा, तो पत्रकारिता सवाल पूछती रहेगी। और यदि समाज विश्वसनीय पत्रकारिता को सम्मान देगा, तो पत्रकारिता अपनी सबसे मजबूत भूमिका में वापस आएगी।
पत्रकारिता की असली ताकत उसकी विश्वसनीयता
आधुनिक भारत की पत्रकारिता एक चौराहे पर खड़ी है। एक रास्ता तेज है। वायरल खबर, उत्तेजक शीर्षक, अधूरी जानकारी और तत्काल लोकप्रियता का रास्ता। दूसरा रास्ता कठिन है। तथ्य जुटाने का, दोनों पक्ष सुनने का, दस्तावेज देखने का, सवाल पूछने का और सत्य की पुष्टि होने तक इंतजार करने का। पहला रास्ता शायद जल्दी लोकप्रिय बना दे, लेकिन दूसरा रास्ता पत्रकार को विश्वसनीय बनाता है और अंततः पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी न तो कैमरा है, न वेबसाइट, न सोशल मीडिया के आंकड़े। उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। जनता का विश्वास। इसी विश्वास को बचाए रखना आधुनिक भारत की पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।
लेखक- रणजीत राय, उप संपादक, खबरें आजतक Live

